सुबीर भौमिक
बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
बर्मा से बड़ी संख्या में चिन आदिवासी भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम की सीमा में दाखिल हो रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें सरकार समर्थक रैलियों में भाग लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
पिछले दो सप्ताह में सैकड़ों चिन आदिवासी बर्मा से भागकर मिज़ोरम आए हैं.
मिज़ोरम की राजधानी आइज़ोल में चिनलैंड की महिला लीग की चेरी ज़हाउ ने कहा, "बर्मा में लोकतंत्र समर्थकों को ख़िलाफ़ सैन्य अभियान के बाद बड़ी संख्या में हमारे लोग भागकर यहाँ आए हैं. हालाँकि हमारे पास उनकी निश्चित संख्या नहीं है."
उन्होंने कहा, “उनके बर्मा छोड़कर भागने की वजह ये है कि बर्मा की सेना उन्हें सरकार समर्थक रैलियों में हिस्सा लेने के लिए दबाव डाल रही है और हमारे चिन लोग ऐसा नहीं करना चाहते.”
उत्पीड़न
बर्मा में 20 लाख से भी अधिक चिन आदिवासी रहते हैं और उनके नेताओं का कहना है कि ईसाई और मूल रूप से बर्मा का न होने के कारण उन्हें भारी कष्ट सहने पड़े हैं.
पिछले दो दशकों में हज़ारों की संख्या में चिन आदिवासी भागकर मिज़ोरम आए हैं.
ज़हाउ ने कहा कि मिज़ोरम पहुँची बहुत सी चिन महिलाओं ने उन्हें बताया है कि सैनिक ग्रामीणों को सरकार समर्थक रैलियों में शामिल होने के लिए मज़बूर कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "अगर ग्रामीण ऐसा नहीं करते तो उन पर 10000 चैट का भारी जुर्माना किया जा रहा है और ग़रीब चिन आदिवासियों के लिए यह बड़ी रकम है."
ज़हाउ ने दावा किया कि कुछ पादरियों समेत जिन चिन आदिवासियों ने सरकार समर्थक रैलियों में जाने से इनकार कर दिया, उन्हें गिरफ़्तार कर सेना के बंदी शिविरों में रखा गया है.
सीएनएफ
भूमिगत चिन नेशनल फ्रंट (सीएनएफ) के तियालख़ल का कहना है कि ऐसी सरकार समर्थक रैलियां इसी महीने हक्का, फलम और चिन क्षेत्र के दूसरे शहरों में हुई हैं.
सीएनएफ 1988 से चिन को बर्मा के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहा है.
तियालख़ल कहते हैं, "लेकिन ये समर्थन ज़ोर जबर्दस्ती का है. हमारे ग्रामीणों को बंदूक की नोक पर रैलियों में भाग लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है."
चिन शरणार्थियों की समस्या पर शोध कर रही क्रिस लेवा का कहना है कि चिन गांव वैसे ही युवाओं से खाली हो गए हैं. अधिकांश युवा भारत भाग आए और यहाँ आने के बाद फिर कहीं और चले गए.
उनका कहना है कि लगभग एक लाख चिन शरणार्थी भारत आए हैं और इनमें से 70 फ़ीसदी मिज़ोरम में.