शनिवार, 20 अक्तूबर, 2007 को 10:05 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
दशहरा का पर्व क़रीब आते ही राजस्थान की राजधानी जयपुर में रावण के पुतलों का पूरा बाज़ार खड़ा हो गया है और तरह-तरह के सजे-धजे रावण बिक्री के लिए तैयार हैं.
वहाँ रावण के पुतलों की 'मंडी' जैसी लग गई है. हर कद, भाव और आकार के रावण बिक्री के लिए तैयार हैं.
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक कहे जाने वाले दशहरे के त्योहार में जलाने के लिए 'मंडी' में पचास से दस हज़ार रूपए की कीमत के रावण उपलब्ध हैं.
बाज़ार में केवल दशानन ही नहीं उनका पूरा कुनबा मौज़ूद है. ग्राहक आते हैं मोल-भाव करते हैं और अपनी-अपनी पसंद का पुतला ले जाते हैं.
मंडी में पहुँचे लोग पुतले के आकार, बड़ी-बड़ी काली मूंछों और हथियारों में उसकी ढाल और तलवार पर ग़ौर करते हैं.
अनुमान है की जयपुर मे हर साल कोई पाँच हज़ार पुतले बिकते हैं, लेकिन बाज़ार के जानकारों के मुताबिक़ इस बार रावणों की संख्या में पिछली बार की तुलना में लगभग 1000 का इज़ाफ़ा हुआ है.
बुराई की हार का प्रतीक
इधर रावण की माँग क्या बढ़ी, कारीगरों को तो सिर उठाने की फ़ुरसत नही मिल रही है. बचपन से ही रावण के पुतले बनाने के धंधे में लगे विजय कुमार का कहना है कि इस बार उनका धंधा ज़ोरदार चल रहा है.
विजय कहते हैं, ''लोग तरह तरह के रावण खरीदने आते हैं, इनकी माँग इतनी बढ़ गई है कि ज़्यादा कारीगर लगाने पड़े है, फ़िर भी समय पर काम पूरा नही हो पा रहा."
रावण भले ही बुराई का प्रतीक हो लेकिन रावण की बढ़ी माँग कारीगरों के लिए ख़ासा काम लेकर आया है. ऐसी ही एक कारीगर शारदा कहती हैं, "भले ही लोगों के लिए ये बुराई का प्रतीक है पर हमारे लिए तो रोज़ी- रोटी है.
पुतला ख़रीद रहे संजीव शर्मा से जब पूछा गया कि रावण जलाकर क्या मिलता है, तो वे कहने लगे कि इससे लोग बुराई और अत्याचार को जलाने की चेष्टा करते हैं.