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मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2007 को 13:11 GMT तक के समाचार

मायावती की नज़र अब दिल्ली पर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई मिसाल क़ायम करने वाली दलित नेता मायावती ने दुनिया की ऐसी आठ महिलाओं की सूची में जगह पाई है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए समाज और व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है.

अमरीकी पत्रिका न्यूज़वीक ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को अपनी 'विमेन एंड लीडरशिप' श्रंखला में मायावती का अब तक का सफ़र, उन्हीं की ज़ुबानी छापा है.

पत्रिका में छपे अपने लेख में बहुजन समाज पार्टी की 51 वर्षीय नेता मायावती कहती हैं, "उत्तर प्रदेश में 17 साल में पहली बार बहुमत प्राप्त करने वाली सरकार सत्ता में है जिसका नेतृत्व किसी दलित नेता के हाथ में है.

दिल्ली का संघर्ष

इसी लेख में मायावती आगे कहती हैं, "हमारा लक्ष्य है कि अब इस जीत के फ़ॉर्मूले को दूसरे राज्यों में भी लागू किया जाए और दिल्ली में सत्ता हासिल करने के बड़े संघर्ष की तैयारी की जाए."

उन्होंने अपने लेख में लिखा है, "एक अविवाहित महिला और एक दलित होने के कारण मुझे गालियों, अपमान और धमकियों का सामना करना पड़ा."

उनका कहना है, "भारत के अनेक नेताओं के तरह मुझे राजनीतिक स्तर पर कोई विशेषाधिकार नहीं मिले. मुझे आज जितनी राजनीतिक ज़मीन हासिल है उसे पाने के लिए मुझे हर इंच के लिए संघर्ष करना पड़ा है."

मायावती अपने लेख में ये भी कहती हैं कि जब ग़रीब दलितों को एकजुट करने के लिए उनकी पार्टी ने आगे बढ़कर क़दम उठाए तो ऊँची जातियों वाले राजनीतिक दल चौंके और उनके विरोध के कारण वह चार बार अपना मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं.

मायावती का कहना है कि इस राजनीतिक माहौल को देखते हुए हमारे लिए यह ज़रूरी हो गया था कि हम अपना राजनीतिक दायरा बढ़ाएं और जाति और धर्म को एक तरफ़ रखकर ग़रीबों को एकजुट करें.

"इसलिए हमने गाँव के स्तर पर सुलह-सफ़ाई बैठकें आयोजित कीं और इनमें धर्म और जाति को दरकिनार रखते हुए सभी ग़रीबों ने हिस्सा लिया. हमारे प्रयासों को धमकियों, हमलों और क़ानूनी दावपेंचों का सामना करना पड़े लेकिन हमने संघर्ष किया और मई 2007 के चुनावों में जीत हासिल की."

मायावती राजनीति का कठिन रास्ता अपनाने के बारे में कहती हैं कि वह दिल्ली के एक दलित परिवार में पैदा हुईं. रिश्तेदारों के गाँव जाने का मौक़ा मिला तो वहाँ बदहाली और अशिक्षा की तस्वीर देखकर उन्हें अहसास हुआ कि दलितों के गाँव कितने उपेक्षित हैं.

मायावती लिखती हैं, "मेरा दिल यह देखकर बहुत दुखा कि ब्राहमणों के पास गाँवों में बेहतरीन घर और ज़मीन होती थी और गाँव के जिस हिस्से में दलित रहते थे वे बहुत पिछड़े हुए होते थे, उन्हें शिक्षा भी उपलब्ध नहीं थी."

"यह देखकर मैंने अपने पिता से कहा कि क्या मैं किसी तरह से दलितों की सहायता कर सकती हूँ. इस पर मेरे पिता ने कहा कि समुचित शिक्षा के बिना लोगों की ठोस मदद नहीं की जा सकती. इसलिए पहले तो मेरी ख़ुद की शिक्षा ही मेरे लिए प्राथमिकता बन गई और उसके बाद कमज़ोर वर्गों की शिक्षा को मैंने प्राथमिकता पर रखा."

मायावती ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा हासिल की, एक अध्यापक की नौकरी की और फिर क़ानून में भी डिग्री हासिल की लेकिन 1984 में वह पूर्ण रूप से राजनीति में दाख़िल हो गईं जब उन्हें बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष कांशीराम ने अपने नेतृत्व में लिया.

मायावती लिखती हैं कि जो मुक़ाम उन्हें आज मिला है उसके लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया है और इस सफ़र में अपमान और धमकियों का भी सामना करना पड़ा है.