सोमवार, 15 अक्तूबर, 2007 को 20:56 GMT तक के समाचार
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई देशों की ओर से विरोध का सामना कर रहे बर्मा के सैनिक शासन की तकलीफ़ कम होती नज़र नहीं आ रही है.
सोमवार को अपना विरोध दर्ज करते हुए यूरोपियन यूनियन की ओर से बर्मा पर नए प्रतिबंध लगाए जाने की स्वीकृति दे दी गई है.
यूरोपियन यूनियन के देशों ने बर्मा में सैनिक शासन द्वारा लोकतंत्र समर्थकों के दमन के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते हुए ये नए प्रतिबंध लगाए हैं.
नए प्रतिबंधों के तहत बर्मा से लकड़ी और धातु के बने सामानों के निर्यात पर रोक लगा दी गई है.
उधर अमरीकी गृह मंत्रालय ने चीन और भारत से अपील की है कि दोनों ही देश बर्मा के सैनिक शासन पर लोकतंत्र समर्थकों का दमन रोकने और उनसे बातचीत करने का दबाव बनाएं.
भारत और चीन बर्मा के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले दो प्रमुख देश हैं.
अमरीकी गृह विभाग चाहता है कि दोनों देश बर्मा के सैनिक शासन पर इस बात को लेकर दबाव बनाएं कि वहाँ लोकतंत्र समर्थक नेताओं को रिहा किया जाए और सरकार उनसे बातचीत करे.
दमन पर चिंता
बर्मा की ताज़ा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए यूरोपियन यूनियन ने यह भी कहा है कि अगर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहिम गम्बारी और बर्मा सरकार के बीच बातचीत में कुछ प्रगति होती है तो इन प्रतिबंधों पर फिर से विचार किया जाएगा.
इब्राहिम गम्बारी को संयुक्त राष्ट्र की ओर से बर्मा की ताज़ा स्थिति पर नज़र रखने के लिए विशेष दूत नियुक्त किया गया है.
बताया जा रहा है कि आगे स्थितियों की समीक्षा के बाद बर्मा पर कुछ और नए प्रतिबंध भी लगाए जाने की स्थिति बन सकती है. ऐसा हुआ तो बर्मा को देश में नए निवेश पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है.
गम्बारी बर्मा में लोकतंत्र समर्थक नेताओं की गिरफ़्तारी को लेकर पहले ही कड़े शब्दों में बर्मा सरकार की आलोचना कर चुके हैं.
सैनिक शासन
उल्लेखनीय है कि बर्मा में सैन्य शासन लागू है और वहाँ पिछले कुछ दिनों से सैन्य शासन के ख़िलाफ़ लोकतंत्र के समर्थक प्रदर्शन कर रहे हैं.
इन प्रदर्शनों और अभियानों को दबाने के लिए हुए बल प्रयोग और हिंसा में दर्जन भर से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोगों को जेलों में डाल दिया गया है.
संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से बर्मा की ताज़ा राजनीतिक स्थिति पर चिंता व्यक्त की जा चुकी है.
इसके बावजूद देश में सैनिक शासन की ओर से कई लोकतंत्र समर्थकों को गिरफ़्तार करके रखा गया है.
सैनिक शासन पर अमानवीय तरीके से लोकतंत्र समर्थकों के अभियान से निपटने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं.