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शुक्रवार, 12 अक्तूबर, 2007 को 14:11 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, अजमेर से

धमाका डिगा नहीं पाया इबादत से

विश्व प्रसिद्ध ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गुरुवार को हुए विस्फोट का ख़ौफ़ श्रद्धालुओं को इबादत से नहीं रोक पाया.

हालाँकि श्रद्दालुओं की संख्या में कमी आई है लेकिन उनका कहना है कि ये कमी क्षणिक है.

धमाकों के बाद दरगाह ने वो भावुक क्षण देखा, जब बांद्रा की नूरजहाँ अपनी दो बेटियों के साथ वहाँ आई.

उन्होंने ख़्वाजा की चौखट को चूमा और फूट-फूट कर रोने लगी.

"खुदा उसे माफ़ नहीं करेगा, जिसने भी ये नापाक हरकत की है. जब से ये सुना है मन ख़राब हो गया है. मेरी आँखों से आँसू थम नहीं रहे हैं." यह कहते हुए नूरजहाँ का दामन आँसुओं से भीग गया.

चश्मदीद

नूरजहाँ ने अपनी दो बेटियों मीराँ और ख़्वाजापीर के सिर पर हाथ फेरा और फफककर रो पड़ी.

उन्होंने कहा, "मेरी दोनो बेटियों का नाम सूफ़ी संतों के नाम पर है. मेरी तीन औलादों का बचपन इस पवित्र आस्ताने में आते-जाते गुज़रा है. दुनिया में कहीं भी धमाके होते तो कोई बात नहीं थी, लेकिन यहाँ नहीं होना चाहिए था."

नूरजहाँ की बेटी ख़्वाजापीर ने कहा, "धमाके हुए तो सोचा शायद इफ़्तार के लिए तोप गूँजी है, लेकिन फिर पता चला कि कोई विस्फोट हुआ है. अम्मी ने रोज़ा खोलने का निवाला लिया कि चीख-पुकार सुनाई देने लगी."

ख़्वाजापीर की बहन मीराँ भी कहती हैं, "जिसने भी धमाका किया, उसने करोड़ों श्रद्धालुओं का दिल तोड़ा है."

पवित्र मकाम

इन माँ- बेटियों को ढांढस बंधाते मिले उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के अवध किशोर. कहने लगे, "आज मानवता का सिर झुका है."

अवध किशोर के लिए यह दरगाह संसार का सबसे पवित्र मकाम है.

अवध किशोर ख़्वाजा की भक्ति में इतने तल्लीन हैं कि रमज़ान माह में रोजा रखते हैं. क्या होली, क्या दीवाली, अवध किशोर के तीज त्योहार इसी दरगाह में मनाए जाते हैं. उनके इलाके में लोग अवध किशोर को 'हिंदुआ मुसलमान' कहते हैं.

अवध किशोर ने उदास आँखों से दरगाह परिसर को देखा और कहने लगे, "पिछले वर्ष इसी दिन यहाँ सुकून का माहौल था और दरगाह श्रद्धालुओं से अटा पड़ा था."

70 साल की मुबीना की सुनें तो वो उस कड़ी का नाम है जो बिहार शरीफ़ को अजमेर शरीफ़ से जोड़ती है.

वो बिहार शरीफ़ की निवासी हैं, लेकिन साल के चार महीने अजमेर शरीफ़ में गुजारती हैं, इबादत के साथ.

धमाकों के बाद पुलिस ने सबूत जुटाए और सूत्र जोड़ने का प्रयास किया, लेकिन मुबीना जैसे अकीदतमंदों की चिंता थी कि बिहार शरीफ़ और अजमेर शरीफ़ जैसे पवित्र स्थानों को कोई ग्रहण न लगे.