बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की ज़मानत मंज़ूर करने वाले हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया है.
अंतरिम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी कि ख़ालिदा ज़िया की ज़मानत मंज़ूर ना की जाए और सुप्रीम कोर्ट ने उसी अपील को स्वीकार कर लिया.
ख़ालिदा ज़िया को भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत नज़रबंद करके रखा गया है और सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का मतलब है कि ख़ालिदा ज़िया नज़रबंद ही रहेंगी. हालाँकि ज़िया इन आरोपों का खंडन करती हैं.
ख़ालिदा ज़िया की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी आवामी लीग की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना भी जबरन धन वसूली और हत्या के आरोपों में नज़रबंद हैं.
बांग्लादेश में जनवरी 2007 से ही आपातकाल लगा हुआ है जब अंतरिम सरकार ने आम चुनाव रद्द कर दिए थे. अंतरिम सरकार ने आपातकाल के दौरान तमाम राजनीतिक गतिविधियों पर भी पाबंदी लगा दी है.
अंतरिम सरकार ने 150 से ज़्यादा राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार भी किया है. सरकार इन गिरफ़्तारियों के लिए दलील देती है कि भ्रष्टाचार को रोकने की कोशिशों के तहत ऐसा किया गया है.
अभियोजन पक्ष के वकीलों का कहना है कि गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ालिदा ज़िया की ज़मानत नामंज़ूर करने का जो फ़ैसला दिया है, उसके बाद ज़िया पर मुक़दमे की कार्रवाई आगे बढ़ाई जाएगी.
ख़ालिदा ज़िया और उनके बेटे अराफ़ात रहमान को सितंबर के आरंभ में गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आरोप हैं कि उन्होंने 2003 में कार्गो के एक ठेके में धांधली की थी.
पिछले सप्ताहांत में हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए और उनके ख़िलाफ़ तमाम आरोप ख़त्म कर दिए जाएँ.
हाई कोर्ट ने कहा था कि ख़ालिदा ज़िया के ख़िलाफ़ लगाए आरोप वैध नहीं क्योंकि उन पर उन विशेष आपातकालीन क़ानूनों के तहत उन कथित अपराधों के लिए मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता जो आपातकाल लगाए जाने से पहले हुए हों.
लेकिन सेना समर्थित अंतरिम सरकार ने गत मंगलवार को हाई कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी. अंतरिम सरकार का कहना है कि वह देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए अभियान चला रही है.