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सोमवार, 01 अक्तूबर, 2007 को 07:45 GMT तक के समाचार

रेणु अगाल,
बीबीसी संवाददाता, चीन से लौटकर

चीन की खूबसूरत बला....शंघाई

शंघाई को आप एक ऐसी खूबसूरत युवती के रूप मैं देख सकते है जो सज संवर कर दुनिया को लुभाने की कोशिश कर रही है....एक ऐसी तवायफ़ जिसकी अदाओं पर दिलफेंक अपनी जायदाद लुटाते है जो अपनी रंगीनियों और अय्याशी के लिए जानी जाती है.

शंघाई को आप पूरब की शान, एक अमूल्य मोती भी मान सकते है और यह कल्पना चीन सरकार की इस शहर की कल्पना से मेल खाती है.

न्यूयॉर्क को टक्कर देने क्षमता रखने वाला शंघाई हालांकि मन मे होन्ग कोंग और सिंगापुर को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है.

शंघाई में वो सब कुछ है जो चीन दुनिया को दिखाना चाहता है सकल घरेलू उत्पाद में ...15 प्रतिशत की सालाना वृद्घि और संपन्नता जो ऐसे आकडों के साथ आती है.

गरीबी यहां दिखाई नहीं देती..या यूं कहें इसे दिखने नही दिया जाता. अगर आप यहा के पुदोंग क्षेत्र जाए तो इस्पात और शीशे की गगनचुम्बी इमारतें देखने मैं आपकी गर्दन ऐंठ जाएगी.

शंघाई को चीन एक मिसाल के तौर पर दुनिया के सामने लाना चाहता था. 17 साल पहले शंघाई के पुदोंग क्षेत्र को विकसित करने के बारे मे चीन सरकार ने जब फ़ैसला किया तो शंघाई के इस हिस्से का का कायाकल्प न हो, ऐसा संभव ही न था.

इन सत्रह सालों में पुदोंग में 33 अरब अमरीकी डॉलर का निवेश हुआ है और 300 बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां व्यापार करती है . जहां चीन की प्रति व्यक्ति औसत आय 1000 डॉलर सालाना है वही शंघाई की प्रति व्यक्ति औसत आय 7000 डॉलर है.

ज़बर्दस्त विकास

भारत में आपको अक्सर नेताओं के ऐसे बयान सुनाई दे जाते हैं कि हम बेंगलूर या मुंबई को शंघाई बना देंगे. पर शंघाई या पुदोंग में चंद घंटे के सफ़र से इस बात का अंदाज़ा लग जाता है कि ऐसे सपने देखने और दिखाने भर के ही हे.इन्हें सच करने में शायद सौ साल लग जाये.

ना वैसी सड़कें, ना दुनिया की सबसे तेज़ चुम्बकीय शक्ति से चलने वाली मेगलेव रेलगाड़ी, ना ऐसी मूलभूत सुविधाएं. और तो और नगरपालिका और पुदोंग जिला प्रशासन की इमारत देख कर आप स्वयं समझ जायेंगे अभी कई कोस चलना बाक़ी है.

हां आप कह सकते हैं कि इस सब के बावजूद जो भारत मे है वो वह नही. भारत मे लोकतंत्र हे. लोग मन कि बात ज़ुबां पर लाते है, सवाल पूछना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है.

पूना से थरमैक्स कंपनी के काम से आया एक नवयुवक कहता है ‘यहां पर काफी प्रतिबंध है.भारत जैसा नहीं है. आप अपने बॉस से सवाल नही पूछ सकते. ये चाहे कंपनी पॉलिसी हो, पर एक व्यक्ति का विकास नहीं हो पाता है.अभी अभी अर्थव्यवस्था खुली है..दुनिया की इनको आदत नहीं..हम तो अंग्रेजो का वर्क कल्चर सीख चुके है.यहां का युवा दुनिया को जानना चाहता है पर युवाओं के लिए बहुत लेट हो चुका है. अब तो प्राईमरी स्कूल से ही इंग्लिश पढ़ाई जाती हैं सब वैश्वीकरण को अपनाने को तैयार है. आप यहां कंपनी खोल सकते है.’

शहरों मे तो ज़मीन सरकार की है पर आप इस्तेमाल के लिए इसे किराये पर ले सकते हैं. तो भारत में विशेष आर्थिक ज़ोन बनाने और भूमि अधिग्रहण पर उठा बवाल यहां नज़र नहीं आता.

हां, हाल मे एक दम्पति ने अपना घर बुल्डोज़रों के हवाले करने से मना कर दिया था और देश भर मे इंटरनेट के ज़रिये उनकी मांगों के लिए जुटे समर्थन के बाद सरकार को उन्हें मुँह मांगी रकम देनी पड़ी थी.

पुदोंग में चीन की झलक

पुदोंग को समझना कुछ हद तक चीन को समझना है. अगर मन में कोई ध्येय तय कर लिया है तो वो हो के ही रहेगा, उसे होना ही है. जहां बीजिंग 2008 के ओलंपिक के बुखार से ग्रस्त है वही शंघाई जी जान लगा कर 2010 के वर्ल्ड एक्सपो के लिए अपने को और आधुनिक बनाने में लगा है.

हां इस उसूल पर नीतियां बनाई जा रही हैं धन कमाना है, सबको अमीर बनाना है.

लेकिन चूंकि विकास और उस से जुडी संपन्नता पूरे देश में एक साथ नही लाई जा सकती इसलिये कुछ शहरों, क्षेत्रों को चुन उन्हें विकसित किया गया है और धीरे धीरे सारा देश विकसित हो जायेगा.

हां यहां भी पिछड़े ग़रीब ग्रामीण इलाकों से भारत की तरह शहरों की तरफ पलायन होता है. पर बड़ा फर्क ये है है कि अगर आप तय समय में रोज़गार नही खोज पाए तो आपको गांव का रास्ता दिखा दिया जाता है.

यहाँ नरीमन प्वाइंट और धारावी साथ साथ नहीं बसते. ग़रीबी की मार से भीख मांगने के लिए मज़बूर कुछ लोग शंघाई की हुंआग्पो नदी के तटबंद पर नज़र आते हैं. शायद जब वो रोशनी से झिलमिलाते, दुल्हन से सजे अपने शहर को देखते होंगे और यहां दुनिया भर के डिजा़इनर कपडे़ पहने, फैशन परस्ती में लगे अमीरज़ादों को देखते होंगे तो कहीं पीछे छूट जाने का ग़म इन्हें ज़रुर कचोटता होगा.

शंघाई का एक यथार्थ ये भी हैं कि जो मेगलेव ( तीव्रतम ट्रेन) की गति से अपने आपको बदल नहीं पाया वो विकास की इस रेल से बाहर फेंक दिया गया.