सोमवार, 01 अक्तूबर, 2007 को 09:23 GMT तक के समाचार
शालिनी जोशी
देहरादून से
उत्तराखंड के राजाजी पार्क में बीमारी की वजह से पीड़ा झेल रही हथिनी अरूंधति की आख़िरकार मौत हो गई है.
अरूंधति नाम की इस हथिनी को दया-मृत्यु देने का मामला विवादों मे उलझ गया था.
अरूंधति, उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में आनेवाले सभी सैलानियों को अपनी पीठ पर बैठाकर जंगल की सैर कराती थी लेकिन बीमारी की वजह से बाद में अरूंधति अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो पाती थी.
इससे पहले कि उसे दयामृत्यु दिए जाने के सवाल पर कोई निर्णय हो पाता, अरुंधति मौत की नींद सो गई.
बुढ़ापे के कारण अब अरूंधति की देह और क्षमता जवाब दे चुकी थी. वन अधिकारियो के मुताबिक पिछले महीने अरूंधति जंगल में एक गहरे दलदल में गिर गई थी.
उसे बड़ी मुश्किल से निकाला गया लेकिन कई जगह से उसके शरीर की हड्डियाँ टूट गईं जिससे वो चलने-फिरने लायक नहीं रही.
उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक श्रीकांत चंदोला ने बताया कि चिकित्सकों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं और ऐसी हालत में अरूंधति को दया मृत्यु देने के आदेश दे दिए गए थे.
विरोध
लेकिन कुछ वन्य जीव प्रेमी इसे एक जानवर की प्रतिष्ठा का मसला करार दिया था और उनका कहना था कि अरूंधति को जबरन मार देना न्यायसंगत नहीं है.
पीपुल्स फॉर एनीमल्स की अध्यक्ष पूजा बहुखंडी ने कहा था, “हम अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे. अरूंधति को इस हाल में पहुचाने के लिये वन अधिकारी ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उसका सही इलाज नहीं किया गया और अब वही अधिकारी अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिये अरूंधति को मारना चाह रहे हैं.”
ये मामला पूर्व पर्यावरण मंत्री और जानवरों के प्रति अपने लगाव और प्रेम के लिए चर्चित मेनका गांधी तक भी पहुँचा और वन अधिकारियो के अनुसार उन्होंने भी फोन पर अरूंधति की ख़ैरियत ली लेकिन सारे हालात से वाकिफ होने के बाद उन्होंने ‘मर्सी किलिंग’ पर अपनी रज़ामंदी दे दी.
इस बीच कुछ वन्य जीव प्रेमियों ने अरूंधति के पास जाकर नारेबाजी भी की. दूसरी ओर कुछ जगहों पर लोग अरूंधति के कुशल होने की प्रार्थना भी की.
ऐसी हालत में राजाजी नेशनल पार्क का प्रशासन कोई कठोर कदम उठाने से हिचकिचाता रहा और अरूंधति को मारने का मसला हर दिन टलता रहा.