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शनिवार, 29 सितंबर, 2007 को 14:29 GMT तक के समाचार

रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

नेपाल में गहराता राजनीतिक संकट

नेपाल की गठबंधन सरकार से माओवादी नेता बाबूराम भट्टराई के हटने की घोषणा के बाद से ही नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है.

बाबू राम भट्टराई ने काठमांडू की एक विशाल रैली में सरकार से हटने की घोषणा की थी.

इस घोषणा के बाद से ही सात पार्टियों के गठबंधन वाली सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत का दौर जारी है.

माओवादियों का कहना है कि उसकी दो प्रमुख मांगों को सरकार ने पूरा नहीं किया इसलिए सरकार में उसके चार मंत्रियों का बना रहना बेमानी था.

माओवादियों का कहना है कि जब तक राजतंत्र ख़त्म नहीं होता, चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण नहीं हो सकते.

साथ ही माओवादी चाहते हैं कि संविधान सभा के लिए समानुपातिक निर्वाचन होना चाहिए. उनकी 22 में से ये दो प्रमुख मांगें नहीं मानी गई हैं इसलिए उन्होंने सरकार से हटने का फैसला लिया है.

चुनावों का डर?

नेपाल के वित्त मंत्री डॉक्टर राम शरण महत इस पर कहते हैं, "उनकी इन मांगों का कोई मतलब नहीं है. लोगों का कहना है कि संविधान सभा से हटने के लिए माओवादी इस तरह के बहाने बना रहे हैं. उनकी बातों से कोई सहमत नहीं है इसलिए मुझे लगता है कि वे अंत तक इन दोनों मांगों पर ज़ोर नहीं देंगे."

इस साल 22 नवंबर को होने जा रहे चुनावों से ठीक पहले माओवादियों के सरकार से हटने पर अटकलों का बाज़ार गर्म है.

साप्ताहिक अख़बार 'समय' के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे कहते हैं, "माओवादियों ने यह महसूस किया है कि चुनाव में उनकी संभावना अच्छी नहीं है. उन्हें यह भी मालूम है कि उनके बिना कोई चुनाव वैधानिक भी नहीं होगा. इसलिए वे अपनी शर्तों को थोपने में लगे हुए हैं."

घिमिरे कहते हैं, "पार्टियों के साथ माओवादियों की लिखित सहमति बनी थी कि राजशाही का भविष्य संविधान सभा तय करेगी. वे मिश्रित चुनाव प्रणाली पर भी तैयार हो गए थे. अब उसके उलट इस तरह का कदम यही संकेत दे रहा है कि उन्हें चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं है."

लेकिन वरिष्ठ माओवादी नेता बाबूराम भट्टराई इन आरोपों को सिरे से नकराते हैं कि उनकी पार्टी चुनाव में ख़राब प्रदर्शन से डर रही है.

भट्टराई कहते हैं, "यह बेकार का तर्क है कि हम डर गए हैं. हमारा आधार ही किसान, दलित, महिलाएँ, मधेशी, जनजाति के बीच है और उनका हमें व्यापक जनसमर्थन है. सब मानते हैं कि माओवादी आंदोलन से ही संविधान सभा, गणतंत्र, राज्य का संघीय रूप जैसे मुद्दे सामने आए हैं. हमें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि राजा के लोग चुनावों में गड़बड़ी न पैदा कर सकें."

वहीं नेपाल की जनता भी देश के बदलते घटनाक्रम को बहुत ध्यान से देख रही है. लोगों का कहना है कि देश में गणतंत्र जरूरी है.

आरोप-प्रत्यारोप का दौर

कुछ लोगों का मानना है कि शांति वार्ता के बाद सरकार में शामिल हुए माओवादियों का यह कदम अंतिम मौके पर धोखा देने जैसा है और देश के लिए ठीक नहीं है. देश में ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है जो यह सोचते हैं कि चुनाव में हारने के डर से वे सरकार से हटे हैं.

माओवादियों के इस फ़ैसले को जायज़ ठहराने वाले लोगों का कहना है कि वे सरकार में तो थे लेकिन उनके पास कोई अधिकार नहीं था.

ऐसे लोगों का मानना है कि माओवादी देश के लिए कुछ करना चाहते थे लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही थी. इनका कहना है कि देश के आर्थिक हालात बदतर हो चले हैं.

नेपाल के राजनीतिक दल इस ओर इशारा करते हैं कि देश में राजा के सभी अधिकार धीरे-धीरे छीने जा चुके हैं. शाही संपत्ति का राष्ट्रीयकरण हो रहा है.

माओवादियों के सामने सवाल

नेपाली कांग्रेस पार्टी अपनी कार्यकारिणी बैठक में नेपाल में गणतंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव पारित करने का मन बना ही चुकी है.

ऐसे में माओवादियों का सरकार से हटना, आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करना और सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने जैसे बयानों पर राम शरण महत कहते हैं, "अविश्वास प्रस्ताव लाने की बातें बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश है. इसका सीधा मतलब है कि उन्हें डर है कि चुनाव में जनता उनका साथ नहीं देगी इसलिए वे संविधान सभा का निर्वाचन नहीं चाहते. वे बिना चुनाव के सत्ता में रहना चाहते हैं."

क्या दस-ग्यारह साल तक छापामार युद्ध लड़ चुके माओवादी समर्थक पिछले एक साल से सत्ता में भागीदार होते हुए भी सत्ता के सुखों को न भोग पाने से नाराज़ हैं? क्या माओवादी नेतृत्व में नीतियों को लेकर मतभेद हैं?

वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे इस मसले पर कहते हैं, "माओवादियों ने काडर को इस मान्यता के साथ 10-12 साल विद्रोह में लगाया कि बंदूक के दम पर राजसत्ता पर कब्ज़ा करेंगे."

घिमिरे कहते हैं, "दूसरी बात कि सात दलों के साथ वे दिल्ली समझौते के तहत आए थे इसलिए प्रचंड और बाबू राम पर दिल्ली का ज़्यादा असर है. माओवादियों के अंदर अमरीका और भारत विरोधी धारा भी काम कर रही है. यह धड़ा अभी मज़बूत दिख रहा है. प्रचंड और बाबू राम पर गजरैल और बाक़ी नेताओं का दबाव है इसलिए इस तरह का कड़ा कदम उठा रहे हैं."

शांति प्रक्रिया

माओवादी नेताओं ने हालांकि ये स्पष्ट किया है कि वे केवल सरकार से अलग हुए है. शांति प्रक्रिया में अब भी उनकी आस्था है.

बाबूराम भट्टराई कहते हैं, "हम सरकार से हटे हैं. शांति समझौता और शांति प्रक्रिया से पीछे नहीं हटे हैं. हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण होगा. हम सशस्त्र युद्ध में नहीं लौट रहे हैं."

देश में इस बीच असमंजस की स्थिति है. तेल की कमी जैसे मसले जनता को खल रही है. सरकार के प्रति जनता में आक्रोश है पर इसका फ़ायदा माओवादी उठा पाएंगे, ऐसा दिखता नहीं है.

वहीं सातों राजनीतिक दलों की छवि देश में कुछ अच्छी नहीं है और लगता नहीं कि उन्होंने इतिहास से कोई सीख ली है.

इस समय राजशाही भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि वो राजनीतिक उथल-पुथल का फ़ायदा उठा सके.

वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे कहते हैं, "देश में राजा ज्ञानेंद्र इतना अलोकप्रिय हो चुके हैं कि राजनीतिक दलों की विफलता से भी उनको कोई लाभ नहीं मिलने वाला है. सरकार देश के पश्चिमी इलाकों में भड़की हिंसा की ज़िम्मेदारी तक नहीं ले रही है. देश के गृह मंत्री की सफलता सिर्फ इसमें दिख रही है कि क़ानून-व्यवस्था की दिक्कतों में वे दरबार का हाथ बता रहे हैं. इसलिए भी सरकार अलोकप्रिय हो रही है."

इस बीच नेपाल में कुछ हिंसक घटनाएं हुई हैं. देश के वित्तमंत्री राम शरण महत इसका आकलन करते करते हुए कहते हैं, "माओवादी चाहते हैं कि संविधान सभा का चुनाव न हो. उसके नेता ने कहा भी है कि हम ऐसा आतंक पैदा कर देंगे कि चुनाव न हो."

नेपाल में 31 हज़ार माओवादी अपने हथियार छोड़ चुके हैं. इस वक़्त वे सरकारी गुजारे-भत्ते पर हैं. वे अपनी हालत से संतुष्ट नहीं हैं.

विश्लेषक कहते हैं कि शांति प्रक्रिया में भारत की भूमिका को लेकर माओवादी नेतृत्व में मतभेद पैदा हुए हैं और असंतोष बढ़ा है.

माओवादी नेता कुछ लोगों को भारत के कुछ तत्वों से मिल रहे समर्थन से नाराज़ हैं.

भारत का रुख़

माओवादी इस समय हिंसा का रास्ता भी नहीं अपनाना चाहते क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दल के रूप में उन्हें मिली मान्यता भी ख़तरे में पड़ जाएगी.

राजनीतिक दलों की छवि भी धूमिल हुई है और राजतंत्र के हिमायती भी बहुत कम बचे हैं.

पड़ोसी देश भारत ने कहा है कि वो चाहता है कि नेपाल की जनता अपना भविष्य तय करे और साथ ही यह भी तय करे कि उसे कैसी सरकार चाहिए.

वहीं नेपाल की जनता की नज़रें माओवादियों और सातों राजनीतिक दलों पर है. क्या वे अपने हित भूलकर देश हित में अगला कदम उठाएंगे?