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गुरुवार, 27 सितंबर, 2007 को 13:38 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

एड्स और समाज से जूझती औरत

राजस्थान में एक अदालत ने एड्स पीड़ित महिला को उसकी बेटी सौंपने से इनकार कर दिया था लेकिन अब उससे ऊपर की अदालत ने इस फ़ैसले पर रोक लगा दी है.

पीड़ित महिला ने इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी है और ऊपरी अदालत ने पिछले फ़ैसले पर तत्काल रोक लगा दी है.

महिला संगठनों ने इस फ़ैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी.

वो एक सौनिक की विधवा हैं जिसे हालात ने एक दोराहे पर ला खड़ा किया है. पति की मौत के कई बाद ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया और नौ साल की उसकी बेटी को सौंपने से इनकार कर दिया.

रेखा ने जयपुर में अदालत का दरवाज़ा खटखटाया तो अदालत ने यह कहकर उसकी गुहार ठुकरा दी थी कि एक एड्स पीड़ित महिला संतान के पालन-पोषण में सक्षम नहीं होगी.

अदालत ने मुक़दमे के दौरान रेखा की पहचान गोपनीय रखने का अनुरोध भी ठुकरा दिया था.

रेखा की अपील में कहा गया था कि एक एड्स पीड़ित की पहचान ज़ाहिर करना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना है.

क़ानूनी लड़ाई

रेखा के वकील एके जैन कहते हैं कि कोई भी ऐसे मामले में पीड़ित का नाम जगजाहिर करता है तो अदालत की अवमानना का मामला बनता है.

जैन कहते हैं, "ज़िंदगी की जंग अपने दम पर लड़ रही रेखा की 1995 में धूमधाम से एक सैनिक के साथ शादी हुई तो उसने ख्वाबों की दुनिया खड़ी की. उसने 1996 में बेटी निशा को जन्म दिया और सब कुछ अच्छा चल रहा था पर एक दिन उसे बताया गया के पति को एड्स हो गया है. रेखा के पति की मौत 2003 में हो गई."

हालात ऐसे बने कि 2006 में रेखा को ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और बेटी से अलग कर दिया तब से रेखा अपनी बेटी को पाने के लिए लड़ रही हैं.

रेखा से उनका दर्द पूछा तो उनका गला भर आया. कहने लगीं कि बेटी को उसका हक़ दिलाना चाहती हूँ.

राजस्थान में ऐसी एड्स पीड़ित महिलाओं के लिए काम कर रही सुशीला कहती हैं, "हमारे साथ 300 महिलाएँ हैं इन औरतों के साथ बहुत बुरा सुलूक होता है. ज्यादातर अनपढ़ हैं और नहीं जानती हैं कि उनके क्या अधिकार हैं, इन विधवाओं को अलग-थलग रहना पड़ता है. हम उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं."

रेखा की लड़ाई पूरे निष्ठुर समाज से है और वह लड़ रही है अपनी बेटी को उसका हक़ दिलवाने के लिए.

(पहचान गुप्त रखने के लिए पीड़ित महिला का नाम बदल दिया गया है)