संजीव श्रीवास्तव
भारत संपादक, बीबीसी हिंदी
जब कांग्रेस प्रवक्ता ने पार्टी संगठन में फेरबदल की घोषणा की तो नए महासचिवों की सूची में राहुल गाँधी का नाम नवें या दसवें नंबर पर डालकर यह संकेत देने की कोशिश की गई कि राहुल की नियुक्ति के समाचार को प्रेक्षक बहुत बढ़ चढकर नहीं आंकें.
पर इस कोशिश का फ्लॉप होना उतना ही तय था जितना राहुल गाँधी का एक दिन कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनना.
24, अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जमा भारी भीड़ को इस बात से कतई मतलब नहीं था कि नए महासचिवों की सूची में राहुल गाँधी का वरीयता क्रम क्या है.
उनके हाथों के झंडे, बैनर और पोस्टर साफ़ यह दास्तान व्यक्त कर रहे थे कि दुनिया चाहे बदल गई है, पर कांग्रेस संस्कृति में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है.
पहले से ही तैयार किए गए बैनर और पोस्टर सिर्फ़ एक ही घोषणा और एक ही नेता से संबंधित थे. सब तरफ पटाखों, नारों और नगाड़ों के बीच सिर्फ़ राहुल गाँधी का ही अभिनंदन था.
नई उम्मीद
कांग्रेसी एक बार फिर एक नए मसीहा, एक नए नेता और एक नई उम्मीद की बात करते थक नहीं रहे थे.
कुछ संजय गाँधी की राजनीति की याद कर रहे थे तो कुछ राजीव गाँधी के महासचिव नियुक्त होने के दिनों को याद कर रहे थे.
इस उल्लास, उत्साह और उन्माद से राहुल के महासचिव बनने से होने वाली लाभ-हानि का ईमानदार विश्लेषण कम से कम कांग्रेस मुख्यालय के बाहर और कांग्रेसियों द्वारा तो अपेक्षित था भी नहीं. आज तो बिल्कुल भी नहीं.
आज कोई यह बात करते नज़र नहीं आ रहा था कि राहुल के महासचिव बन जाने से क्या गुजरात में कांग्रेस के वोट बढ़ जाएँगे.
या फिर एक सांसद की तरह राहुल गाँधी क्या कम सक्षम और प्रासंगिक थे. और क्या इसलिए ही उत्तर प्रदेश में उनकी धुआँधार चुनावी मुहिम का आशातीत असर नहीं हुआ था.
शायद यह विश्लेषण और तुलना उचित है भी नहीं. सिर्फ़ गाँधी परिवार के सदस्य की भूमिका से राहुल पहली बार तब बाहर निकले, जब वह अपनी बहन प्रियंका के साथ जनवरी 2004 में अमेठी गए और जनता के बीच घुले मिले.
फिर उन्होंने चुनाव चुनाव लड़ा और सांसद बने. सार्वजनिक जीवन में एक और क़दम.
कोशिश
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले वह कभी सीधे तौर पर वह अमेठी-रायबरेली की राजनीति से बाहर नहीं निकले.
और अब उत्तर प्रदेश के चुनावों में करारी हार के बाद और अगले वर्ष समय से पहले आम चुनाव की अटकलों के बीच राहुल गाँधी दरअसल पहली बार स्वयं को कांग्रेस और जननेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.
अमेठी-रायबरेली उनके लिए घर के आंगन के समान है. जनता के दरबार में, महारथियों से भरे देश के चुनावी दंगल में यह राहुल का एक तरह से पहला क़दम है.
आज के बाद वह कभी नहीं कह पाएँगे कि वह उतनी ही राजनीति करेंगे जितना कि वह चाहेंगे. अमेठी से कांग्रेस सांसद के पास यह विकल्प था, कांग्रेस के महासचिव के पास नहीं.
आज के बाद राहुल को देशभर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को उसी तरह समय देना होगा, जो अब तक उन्होंने सिर्फ़ अमेठी के लोगों को दिया है.
सांसद रहते हुए भी राहुल अब तक एक निजी व्यक्ति की जिंदगी बिताने के लिए स्वतंत्र थे.
कांग्रेसजनों के लिए वह आज से एक सार्वजनिक व्यक्ति हैं और अगर वह यह बदलाव लाने में कामयाब नहीं होते तो अपना ही नुक़सान करेंगे.
ज़िम्मेदारी
पिछले लगभग चार वर्ष में राहुल एक प्रकार से भारतीय राजनीति के छात्र रहे हैं.
अब महासचिव पद पर आसीन हो उन्हें विषयों और व्यक्तियों दोनों के बारे में फ़ैसले लेने पड़ेंगे. हर टेढे प्रश्न पर वह आलाकमान से पूछिए, नहीं कह पाएँगे.
अब तक वह अघोषित आलाकमान थे. अब लोग उन्हें आलाकमान यानी कांग्रेस अध्यक्षा के पहले सेनापति के रूप में देखेंगे.
राहुल में एक ईमानदारी है. कुछ कर गुजरने की चाह भी. राजनीति के दाँव-पेंच, क्षेत्रीय एवं जातीय समीकरण और अपने राजनीतिक विरोधियों और समर्थकों के बारे में उन्होंने एक अच्छे शोध छात्र जैसा अध्ययन किया है.
लेकिन अब क्लासरूम और थ्योरी का समय निकल चुका है. राहुल को राजनीतिक कामयाबी हासिल करने के लिए अब सड़क पर निकलना होगा और व्यावहारिक राजनीति करनी होगी.
देखना यह है कि वह ऐसा कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से करने में सफल रहते हैं.