शनिवार, 22 सितंबर, 2007 को 11:36 GMT तक के समाचार
राजस्थान ने ब्रितानी राज में बने 146 साल पुराने भारतीय पुलिस क़ानून को अलविदा कह दिया है. राज्य विधानसभा में पारित नए विधेयक में पुलिस की भूमिका, कर्तव्य और जवाबदेही को नए सिरे से परिभाषित किया गया है.
राज्यपाल की स्वीकृति के बाद पूरे राज्य में प्रभावी होने वाले राजस्थान पुलिस बिल 2007 के तहत सरकार आम लोगों को विशेष पुलिस अधिकारी और ग्राम रक्षक बना सकती है.
1861 में बने पुराने पुलिस क़ानून की जगह लेने वाले इस नए क़ानून के मसौदे पर विधानसभा में बहस नहीं हो पाई. उधर मानवाधिकार संगठनों ने नए क़ानून को ख़तरनाक बताया है.
'जनता की सहभागिता'
नए क़ानून में जानवरों को बेरहमी से पीटने, सड़क पर अवरोध पैदा करने और शरीर के भद्दे प्रदर्शन करने पर दंड की व्यवस्था की गई है. इसमें राज्य पुलिस आयोग और पुलिस स्थापना बोर्ड का भी प्रावधान है. क़ानून की मंशा दस लाख से ज़्यादा आबादी वाले शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने की है.
इस क़ानून के तहत सड़क या आम रास्ते पर बाधा पैदा करने पर 50 रूपए का जुर्माना और आठ दिन की जेल हो सकती है. हाल में आरक्षण आंदोलन के दौरान अनेक स्थानों पर राजमार्गों को बाधित किया गया था.
इसमें पशुओं की उग्र सवारी करना, यात्रियों को बाधा पहुंचाना, माल को बिक्री के लिए आरक्षित रखना, रास्तों पर कचरा फेंकना और शरीर का भद्दा प्रदर्शन करना भी दंडनीय होगा.
नए क़ानून में आपत्तिजनक आचरण दंडनीय हो गया है. सार्वजनिक स्थान पर ऐसा करने वालों पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है. अफ़वाहें फैलाना और पुलिस को झूठी सूचना देना भी दंडनीय होगा. किसी महिला को भद्दे इशारे करना, अशिष्ट फ़ोन करना और उसका पीछा करना क़ानून के तहत अपराध होगा.
'जवाबदेही गायब'
राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया कहते हैं, "पहली बार हम अंग्रेज़ों के बनाए क़ानून से बाहर निकले हैं. नए क़ानून में जनता की सहभागिता सुनिश्चित की गई है. राज्य पुलिस आयोग लगातार सुधार के सुझाव देगा. पुलिस को जवाबदेह बनाया गया है."
लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "नए क़ानून से जवाबदेही का पहलू पूरी तरह गायब कर दिया गया है. यह जनविरोधी है. इसके प्रावधान लोगों को परेशान करने वाले हैं. इससे पुलिस और निरंकुश हो जाएगी. हम राज्यपाल से कार्रवाई की गुहार करेंगे."
जमात-ए-इस्लामी के सलीम इंजीनियर ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है. इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को लगता है कि ग्राम रक्षक जैसे पदों पर राजनीतिक कार्यकर्ता तैनात होंगे.
इस क़ानून को 22 सितंबर, 2006 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में पुलिस सुधार को लेकर उठाए गए सात बिंदुओं से जोड़कर देखा जा रहा है.
विधेयक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बीडी काला ने तीन संशोधन सुझाए थे लेकिन सरकार ने उसे नहीं माना. काला का कहना है, "बिल में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के कई निर्देशों का पालन नहीं किया गया है. विधि व्यवस्था और जांच के काम को अलग-अलग करने के निर्देश की अनदेखी की गई है."