गुरुवार, 20 सितंबर, 2007 को 21:11 GMT तक के समाचार
रामसेतु को लेकर चल रहे विवाद पर सफ़ाई देने के लिए केंद्रीय संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की है.
उन्होंने रामसेतु को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर विवादित हलफ़नामे को लेकर अपनी और अपने मंत्रालय की भूमिका को स्पष्ट किया है.
उल्लेखनीय है कि हलफ़नामे पर उठे विवाद के बाद कांग्रेस पार्टी के ही दो वरिष्ठ नेताओं ने कहा था कि अंबिका सोनी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.
इसके बाद अंबिका सोनी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात की थी और प्रधानमंत्री से मिलने का समय माँगा था.
इस बीच कांग्रेस ने पार्टी नेताओं को सख़्त हिदायत दी है कि वे राम और रामसेतु के संवेदनशील मुद्दे पर कोई ग़ैरज़रुरी टिप्पणी न करें.
संतुष्ट
सर्जरी के बाद आराम कर रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार को अंबिका सोनी को मिलने का समय दिया.
कोई आधे घंटे की मुलाक़ात के बाद अंबिका सोनी ने पत्रकारों से कहा कि वे इस बात से संतुष्ट हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री के सामने सभी बातों को स्पष्ट करने का मौक़ा मिला.
अंबिका सोनी ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को सभी दस्तावेज़ दिखाए हैं और तथ्यों से अवगत करवाया है.
हालांकि इस मुलाक़ात के बाद भावुक दिख रहीं अंबिका सोनी ने यह भी कहा, "एक बात मुझे समय में आई है कि ईमानदारी से और नियमानुसार अपना काम करना भर ज़रुरी नहीं है, राजनीति में दूसरी चीज़ें भी सिखनी पड़ती हैं."
हालांकि उन्होंने इतना ही कहा लेकिन साफ़ था कि वे पार्टी के कुछ नेताओं के व्यवहार से दुखी थीं.
उल्लेखनीय है कि पहले वाणिज्य राज्य मंत्री जयराम रमेश और बाद में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आरके धवन ने कहा था कि हलफ़नामें के मामले में संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था.
धवन का कहना था कि नैतिकता के आधार पर संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी यदि पद से इस्तीफा देतीं तो अच्छा होता.
इससे पहले जयराम रमेश भी सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अंबिका की जगह अगर वह होते तो नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा दे देते.
सारा मामला सेतुसमुद्रम परियोजना पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के हलफ़नामे से शुरू हुआ जिसमें कहा गया कि रामायण और इसके पात्र मिथक हैं जिनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलता है.
हिंदूवादी संगठनों के साथ-साथ केंद्र सरकार को समर्थन दे रहे वाम दलों ने भी इसे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया जिसके बाद विवादास्पद हलफ़नामे को वापस लेने का फ़ैसला हुआ.