गुरुवार, 13 सितंबर, 2007 को 05:35 GMT तक के समाचार
लाल क़िले पर वर्ष 2000 में हुए चरमपंथी हमले के सिलसिले में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद आरिफ़ उर्फ़ अशफ़ाक को सुनाई गई मौत की सज़ा को बरक़रार रखा है.
यह सज़ा अक्तूबर 2005 में निचली अदालत ने सुनाई थी.
गुरुवार को इस मामले पर फ़ैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने छह अन्य लोगों को बरी कर दिया है. जिनको बरी किया गया है उनमें अशफ़ाक की भारतीय पत्नी रहमाना शामिल हैं.
उल्लेखनीय है कि 22 दिसंबर, 2000 को दिल्ली के लाल क़िले पर चरमपंथी हमला हुआ था जिसमें दो पुलिसकर्मी और एक आम नागरिक की मौत हो गई थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी लश्करे तैबा ने ली थी.
मोहम्मद आरिफ़ उर्फ़ अशफ़ाक ने निचली अदालत के फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार न्यायाधीश आरएस सोंढी और न्यायमूर्ति पीके भसीन के एक पीठ ने उनकी अपील नामंज़ूर कर दी.
अशफ़ाक के पिता नज़ीर अहमद क़ासिद और उनके बेटे फ़ारूक़ क़ासिद को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.
अशफ़ाक़ की भारतीय पत्नी रहमाना सहित अन्य चार लोगों को सात वर्ष कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.
अभियोजन पक्ष चाहता था कि नज़ीर क़ासिद और फ़ारुख़ क़ासिद को मौत की सज़ा दे दी जाए और जिन लोगों को सात साल की सज़ा सुनाई गई है उन्हें आजीवन कारावास दे दिया जाए.
लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के पीठ ने इन सभी छह लोगों को बरी कर दिया है.
निचली अदालत ने पहले ही चार लोगों को दोषमुक्त क़रार दिया था.
उनमें मूलचंद, राजीव मलहोत्रा, देवेंदर और शहंशाह थे. इन लोगों पर दोषी लोगों के लिए राशनकार्ड बनाने और सहायता पहुँचाने का आरोप था.