बुधवार, 12 सितंबर, 2007 को 08:42 GMT तक के समाचार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि 'राम-सेतु' के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.
कोर्ट को सौंपे गए अपने हलफ़नामे में एएसआई ने कहा है कि 'एडम्स ब्रिज' के नाम से प्रचलित इस कथित सेतु को अब तक पुरातात्विक अध्ययन के योग्य भी नहीं माना गया है.
उल्लेखनीय है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 'सेतु' को तोड़ने पर रोक लगा दी थी और एएसआई को इस बारे में जवाब पेश करने को कहा था.
एएसआई के निदेशक (स्मारक) सी. दोरजी की ओर से दायर किए गए शपथ पत्र में कहा गया है कि 'एडम्स ब्रिज' को लेकर ऐसे कोई प्रमाण कभी नहीं मिले जिससे एएसआई को इसका सर्वेक्षण करने की ज़रुरत महसूस हुई हो.
इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को होनी है.
मिथक कथा
एएसआई ने तीस पृष्ठों के अपने जवाब में कहा है कि रामायण एक मिथकीय कथा है जिसका आधार वाल्मिकी रामायण और रामचरित मानस है.
एएसआई ने कहा है, "ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिससे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रुप से इस कथा के प्रामाणिक होने और इस कथा के पात्रों के होने का प्रमाण मिलता हो."
इसी रामायण कथा को आधार बनाकर हिंदू संगठन कह रहे हैं कि 'एडम्स ब्रिज' दरअसल रामसेतु है और इसका निर्माण भगवान राम ने वानरों की मदद से किया था.
भारत सरकार ने यहाँ सेतु समुद्रम नाम की एक परियोजना शुरु की है जिसके तहत भारत और श्रीलंका के बीच जहाज़ों के आने जाने के लिए एक रास्ता बनाया जाना है.
इस परियोजना के पूरा होने के बाद भारत के पूर्वी भाग से पश्चिमी भाग तक जाने के लिए जहाज़ों को श्रीलंका का चक्कर नहीं काटना पड़ेगा.
सरकार का कहना है कि इससे क्षेत्र में व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और आवागमन सुलभ हो सकेगा.