मंगलवार, 11 सितंबर, 2007 को 07:24 GMT तक के समाचार
मोहम्मद हनीफ़
बीबीसी उर्दू सेवा प्रमुख
पाकिस्तान एयरलाइंस की उड़ान संख्या 786 पर नवाज़ शरीफ़ के साथ लंदन से सफ़र करने वाले पत्रकार एक दूसरे को बता रहे थे कि ये ऐतिहासिक सफ़र है.
सात साल से निर्वासित एक राजनीतिक नेता की वापसी, एक राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत, ईरान के नेता ख़ुमैनी जैसी क्रांति न सही तो कम से कम 1986 में बेनज़ीर भुट्टो को मिले अभिवादन जैसा ज़रुर था.
लेकिन इस्लामाबाद के चकलाला एयरपोर्ट पर नवाज़ शरीफ़ को मिली पंजाब पुलिस की परंपरिक मेहमाननवाज़ी. पहले सलामी, फिर चाय-बिस्कुट और फिर गिरफ़्तारी का ऐलान, फिर धक्के और आख़िर में दर्जनों कैमरों के सामने देश के एक नागरिक का दोबारा निर्वासन.
लैंड करने से चंद मिनट पहले तक फ़्लाइट में सब सामान्य था. जहाज़ के कर्मचारी यात्रियों को ड्यूटी फ़्री डिजिटल कुरान और चाकलेट बेचने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. बच्चे रो रहे थे.
जहाज़ जैसे ही लैंड करने के लिए नीचे आया, नवाज़ शरीफ़ 'इकोनोमी क्लास' में आए. उनके गाल पॉलिश किए हुए सेब की तरह चमक रहे थे. उनके नए बालों के नीचे पसीना नज़र आ रहा था.
चेहरे पर उस व्यक्ति जैसे भाव थे जिसने बहुत बड़ा क़दम उठा लिया हो लेकिन उसे पता न हो वो खाई में गिरेगा या सातवें आसमान पर पहुँचेगा.
मैंने सोचा कि क्या कान के साथ लगातार मोबाइल फ़ोन लगाए हुए इस व्यक्ति को पता है कि उसके साथ क्या होने वाला है?
निर्वासन या जेल?
उनके हर साथी के पास यही जवाब था लेकिन यूं लग रहा था कि अपने राजनीतिक विकल्पों के ख़त्म हो जाने के बावजूद नवाज़ शरीफ़ किसी चमत्कार की उम्मीद में थे.
ये उम्मीद उस समय ख़त्म होनी शुरू हुई जब एक पुलिसकर्मी ने उन्हें आकर सैल्यूट किया और साथ चलने को कहा. नवाज़ शरीफ़ के साथी भावुक थे लेकिन बिना किसी योजना के...
जहाज़ से उतरें या न उतरें, पासपोर्ट इमीग्रेशन वाले को दे या न दें, या बस जहाज़ में बैठें या 'जाओ मुशर्रफ़ जाओ' के नारे लगाते रहें. सिवाय लार्ड नजी़र ने जिन्होंने कहा कि आओ ब्रिटिश तरीके से बातचीत करते हैं.
क़ानून लागू करने वाले या फिर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद क़ानून तोड़ने वाले लोगों (सरकारी अधिकारी) का सब्र बड़ा था लेकिन इरादा पक्का.
नीचे आ जाइए.....चलो नीचे आ जाएंगे...लेकिन पुलिस वालों को हटाओ, पुलिस वाले हटे. उनकी जगह बिना वर्दी वाले आ गए जो न जाने क्यों हमेशा ज़्यादा ख़तरनाक लगते हैं.
बस तक चल कर नहीं जाएंगे.....चलो बस जहाज़ से लगा देते हैं. उस वक़्त तक लॉर्ड नज़ीर का मंसूबा कामयाब होता लग रहा था.
पक्का इरादा
नवाज़ शरीफ़ जहाज़ की सीढ़ियों से उतरे और लोकप्रिय नेता का 'पोज़' बनाकर हाथ हिलाया.
इसके जवाब में दूर खड़े पुलिस के एक दस्ते में से कुछ लोगों ने हाथ हिलाया लेकिन इसके अलावा मीलों दूर तक फैले एयरपोर्ट पर वीरानी ही वीरानी थी.
बस में खड़े होकर नवाज़ शरीफ़ ने जेब से कंघी निकाली और अपने नए बालों को संवारा.
इसके बाद रॉयल लाउंज में मोबाइल फ़ोन मिलाने की नाकाम कोशिशें होती रहीं. मीडिया बेताब - कि अब क्या होगा?
नवाज़ शरीफ़ के चेहरे पर पसीने की हल्की सी तह बन चुकी थी.
ख़ुमैनी बनने का ख़्वाब पंजाब पुलिस के कमांडोज़ के इरादों से सर टकरा कर बिखर रहा था.
आहिस्ता-आहिस्ता सादे कपड़े वालों की टुकड़ियों के बीच बातचीत तेज़ होने लगी. वॉकी-टॉकी पर खुसर-पुसर बढ़ती गई और लॉर्ड नज़ीर अहमद का मशवरा ठंडा पड़ने लगा.
चलो कुछ और नहीं तो चाय ही पिला दो..........नवाज़ शरीफ़ ने चाय पी और सुकून के साथ केक खाया.
कैसा लग रहा है......एक अँग्रेज़ रिपोर्टर ने पूछा...नवाज़ शरीफ़ ने चाय का घूँट लिया और कहा....अब तक तो अच्छा है आगे का पता नहीं.
जब ड्रॉप सीन शुरु हुआ तो बस चंद मिनट लगे. वर्दी वालों ने हाथ में हाथ डालकर घेरा डाला. उनके पीछे बगैर वर्दी वालों ने और मज़बूत घेरा डाला और ले चले........
नवाज़ शरीफ़ के साथियों का विरोध बस औपचारिकता मात्र था.
''धक्के न दो....ये तुम्हारा वज़ीरे आज़म रहा है..धक्के तुम दे रहे हो.....बदतमीज़ी न करो...तुम बदतमीज़ी न करो... तुमने अच्छा नहीं किया ...पछताओगे....आप तो पढ़े लिखे लोग हैं...''
इस सारे शोर-शराबे और धक्का-मुक्की के दौरान नवाज़ शरीफ़ के चेहरे पर पहली दफ़ा मुकम्मल सुकून था.
उस शख्स का सुकून जिसकी सबसे बड़ी आशंका सही साबित हुई थी...