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सोमवार, 10 सितंबर, 2007 को 15:55 GMT तक के समाचार

नवाज़ शरीफ़ का जीवन परिचय

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को इस्लामाबाद पहुँचने के कुछ घंटों बाद ही एक बार फिर सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया है.

वे करीब सात साल बाद पाकिस्तान वापस लौटे थे.

हाल के कुछ महीनों में वे एक बार फिर पाकिस्तान की राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरे हैं.

जबकि एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे किसी तरह के समझौते के लिए पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ से बात कर रही हैं.

वहीं नवाज़ शरीफ़ की पार्टी ने आगामी चुनाव से पहले कई विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बनाया है.

एक समय नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तान के सबसे ताक़तवर राजनेता माना जाता था. पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों में उनकी पार्टी को बहुमत हासिल था.

लेकिन 1999 में हुए तख़्ता पल्ट ने सब कुछ बदल दिया. एक नाटकीय घटनाक्रम में वर्ष 1999 में सेना ने तख़्ता पल्ट दिया और नवाज़ शरीफ़ को गिरफ़्तार कर लिया गया.

उन्हें अपहरण और आतंकवाद के आरोप में उम्र क़ैद कर दी गई. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए और राजनीतिक गतिविधियाँ में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई.

लेकिन सऊदी अरब सरकार की पहल पर हुए एक कथित समझौते के तहत नवाज़ शरीफ़ जेल से बाहर आए.

राजनीतिक सफ़र

नवाज़ शरीफ़ और उनके परिवार के 40 सदस्यों को सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया. माना जाता है कि ये समझौता 10 साल के लिए था.

नवाज़ शरीफ़ का जन्म 1949 में लाहौर में हुआ. वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता में तब आए जब जनरल ज़िया के सैनिक शासन के दौरान वे पंजाब सरकार में शामिल हुए.

वे पहले वित्त मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान वे काफ़ी बेहतरीन प्रशासक साबित हुए.

फिर 1990 में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने लेकिन 1993 में ही उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया. उनकी जगह बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनी.

वर्ष 1997 को नवाज़ शरीफ़ एक बार फिर प्रधानमंत्री चुने गए और उन्हें बहुमत हासिल हुई. इस दौरान उन्होंने कई संवैधानिक बदलाव किए.

माना जा रहा है कि इन बदलावों का मकसद ये था कि उनके शासन के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ न उठाए.

नवाज़ शरीफ़ ने उस संवैधानिक संशोधन को भी पल्ट दिया जिसके तहत राष्ट्रपति देश के प्रधानमंत्री को बर्ख़ास्त कर सकता था.

इस दौरान तत्कालीन प्रमुख न्यायाधीश सज्जाद अली शाह के साथ भी नवाज़ शरीफ़ के साथ अनबन शुरु हो गई.

सेना के साथ टकराव

सेना के साथ भी उनका तनाव बढ़ता जा रहा था. 1998 में सेना के एक पूर्व प्रमुख ने कहा कि सरकार चलाने में सेना की भूमिका होनी चाहिए.

1999 में नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय प्रशासित कश्मीर से पाकिस्तान समर्थित लड़ाकों को वापस बुला लिया.

उसी वर्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने तख़्ता पलट दिया और देश के राष्ट्रपति बन गए जिससे ये साबित हुआ कि पाकिस्तान में सेना का प्रभाव करने की कोशिश किसी भी राजनेत के लिए कितनी घातक साबित हो सकती है.

सक्रिय राजनीति से हटने के बाद नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग में मतभेद सामने आने लगे.

नवाज़ शरीफ़ की पत्नी समेत कई नेताओं ने विपक्षी गठबंधन बनाकर सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने की बात उठाई लेकिन इसका मतलब होता बेनज़ीर भुट्टो के साथ हाथ मिलाना.

पाकिस्तान मुस्लिम लीग के कई नेताओं को बात पसंद नहीं आई. नवाज़ शरीफ़ के निर्वासन के बाद उनकी पार्टी के दो फाड़ हो गए.

शुजात हुसैन समेत पाकिस्तान मुस्लिम लीग के कई नेता जनरल मुशर्रफ़ के साथ हो लिए.

वर्ष 2002 में हुए आम चुनाव में इन्हीं नेताओं ने पीएमएल-क्यू( क़ैद ए आज़म) पार्टी बनाई जो मुशर्रफ़ का समर्थक मानी जाती है.

पीएमएल-क्यू को 2002 में सरकार बनाने के लिए चुना गया हालांकि इसमें बड़े स्तर पर धाँधली के आरोप लगाए गए.

उसके बाद से सेना के नेतृत्व वाले प्रशासन के लिए पीएमएल-क्यू मुख्य पार्टी की तरह काम करती रही है.

कई लोगों को नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान वापसी से काफ़ी उम्मीदें थी लेकिन उनको दोबारा निर्वासित किए जाने से खेल फिर बदल गया है.