सोमवार, 10 सितंबर, 2007 को 02:50 GMT तक के समाचार
एम इलियास खान
बीबीसी संवाददाता, कराची
पाकिस्तान में आने वाले दिनों में होने वाले चुनाव और ऐसे समय में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की वापसी देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है.
सात वर्ष पहले 12 अक्तूबर 1999 को सत्ता पर काबिज़ होने के बाद राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पदच्युत प्रधानमंत्री को कई महीनों तक जेल में रखा जिसके बाद उन्हें निर्वासित कर दिया गया.
अब नवाज़ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के तहत देश वापस लौट रहे हैं और उनकी वापसी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए बड़ी चुनौती का सबब बन सकता है.
जब से सुप्रीम कोर्ट ने नवाज़ शरीफ़ को वापस आने की अनुमति दी है, पूरे देश में उन्हें पुरज़ोर समर्थन मिल रहा है.
कई क्षेत्रीय दलों ने पूर्व प्रधानमंत्री को समर्थन जताया है और उम्मीद की जा रही है कि अगर नवाज़ को पाकिस्तान में रहने दिया जाता है तो वो एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई शुरु कर सकते हैं.
हालांकि पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़) में नवाज़ शरीफ़ सबसे बड़े या करिश्माई नेता नहीं है लेकिन चूंकि वो दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं उनका राजनीतिक कद बड़ा हो जाता है.
इतना ही नहीं सैन्य तख्तापलट के कारण लोगों को उनसे सहानुभूति भी हो रही है.
मुशर्रफ़ की मुश्किलें
पिछले कुछ समय में राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के ख़िलाफ विरोध के स्वर मुखर हुए हैं और उनकी मुश्किलें बढ़ी ही हैं.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की बर्खास्तगी के मामले में उनकी स्थिति कमज़ोर हुई है क्योंकि हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद जब सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के तहत मुख्य न्यायाधीश को फिर बहाल किया गया और मुशर्रफ़ को यह फ़ैसला मानना पड़ा.
इससे उत्साहित वकीलों ने अब कोशिश शुरु कर दी है कि मुशर्रफ़ दोबारा चुनाव न लड़ पाएं.
मुशर्रफ़ के लिए ये दिक्कतें ऐसे समय में हुई है जब उनका कार्यकाल दो महीने बाद ख़त्म होना है. सैन्य प्रमुख के रुप मे उनका कार्यकाल अगस्त 2003 में ही समाप्त हो गया था लेकिन संसद में नए अध्यादेश के ज़रिए उन्हें 15 अक्तूबर 2007 तक सैन्य प्रमुख और राष्ट्रपति पद पर बने रहने की अनुमति मिल गई थी.
मुशर्रफ़ कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें किसी तरह ये दोनों पद अपने पास रखने का विकल्प मिले लेकिन क़ानूनी रुप से ये संभव नहीं है.
ऐसे में अगर नवाज़ शरीफ़ जनांदोलन छेड़ने में कामयाब होते हैं तो मुशर्रफ़ क्या करेंगे कहना मुश्किल है.
दोहरी रणनीति
हालांकि सैन्य सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है.
एक ओर जहां मुस्लिम लीग के समर्थकों को गिरफ्तार किया जा रहा है वहीं सरकारी अधिकारी तरह तरह की धमकियां दे रहे हैं कि नवाज़ शरीफ़ को गिरफ्तार करके वापस भेज दिया जाएगा.
पिछले महीने सरकार ने अदालतों से एक बार फिर नवाज़ शरीफ़ और उनके परिवारवालों के ख़िलाफ भ्रष्टाचार के मामले दोबारा शुरु करने की सिफारिश की है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन मामलों में शरीफ़ को ज़मानत मिल जाएगी.
माना जाता है कि अगर सैन्य सरकार चाहे तो नवाज़ शरीफ़ को कुछ मामलों में जेल में डाल सकती है लेकिन ऐसा करना सरकार को कितना फ़ायदा पहुंचाएगा, इसको लेकर राय अलग अलग है .
नवाज़ शरीफ़ के विरोधियों का तर्क है कि 1999 में जब उन्हें जेल में डाला गया था तो वो जेल के कष्टों से तंग आकर मुशर्रफ़ से समझौता करके निर्वासन के लिए तैयार हो गए थे इसलिए उन्हें एक बार फिर जेल में डालना चाहिए.
उधर दूसरी तरफ विशेषज्ञ मानते हैं कि अब नवाज़ शरीफ़ इस बात को समझ गए हैं कि अगर वो पाकिस्तान न लौटे तो उनका राजनीतिक कैरियर समाप्त है और अगर लौटने के बाद गिरफ्तारी हुई तो वो हीरो की तरह देश की राजनीति में उभर सकेंगे.