रविवार, 09 सितंबर, 2007 को 14:33 GMT तक के समाचार
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, कालाहांडी से
उड़ीसा के कालाहांडी में भूख से मौतों के मामले उजागर न हों, इसके लिए नेता स्थानीय लोगों और पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
स्थिति यह है कि जब बीबीसी की टीम इस भूखमरी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव को झेल रहे क्षेत्र में पहुँची तो स्थानीय नेताओं ने लोगों पर 'सच' न बयान करने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया.
बीबीसी की टीम जहां जाती, नेता वहाँ पहुँच जाते और लोगों के बयान बदलवाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते. हालांकि लोगों ने उनके इस मंसूबे को सफल नहीं होने दिया और प्रशासन की ओर से किए गए प्रयासों के सच को बेबाक़ी से बीबीसी के सामने रखा.
लोगों ने बताया कि किस तरह से अनाज की आपूर्ति पिछले कुछ महीनों से क्षेत्र में नहीं की गई है और उन्हें कुछ जंगली फलों, बीजों पर निर्भर होना पड़ा है.
मसलन, एक स्थानीय नेता ने हमें बीच में ही टोककर कहा, "यहाँ के लोगों को चावल दिया जाता है तब भी वे चावल नहीं खाना चाहते, ये तो केवल जंगली फल खाना चाहते हैं."
अभाव का खाका
लोगों के यह कहने पर कि ऐसा कहना ग़लत है और पिछले आठ महीने से पैसे लेने के बावजूद सरकारी अनाज की दुकान से उन्हें अन्न का एक दाना भी नहीं मिला है, ये नेता कहते हैं कि थोड़ी-सी ग़लती हो गई है.
इन्हें और सरकारी अधिकारियों को इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि जिसे वे छोटी सी ग़लती बताते हैं उसकी क़ीमत कितने ही लोगों की ज़िंदगी है.
क्षेत्र के विकास की स्थिति ऐसी है कि पिछले कई बरसों से न तो यहाँ सड़क है, न पीने का पानी, न खाने के लिए अनाज की उपलब्धता, न सिंचाई और खेती के समुचित साधन, न रोज़गार के अवसर और न ही चिकित्सा की उचित व्यवस्था.
कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के इस त्रिकोण का क्षेत्रफल उड़ीसा के कुळ क्षेत्रफल का 30.59 प्रतिशत है और यहाँ राज्य की 19.72 प्रतिशत आबादी बसती है.
कुल आबादी का 72 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जो ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने को विवश है.
यहाँ की आबादी का 38.72 प्रतिशत आदिवासी हैं और 16.63 प्रतिशत हरिजन हैं.
1997 के सर्वेक्षण के मुताबिक यहाँ के 49 ब्लॉक पिछड़े घोषित किए जा चुके हैं.
यहां की स्थिति की गंभीरता को समझते हुए केंद्र सरकार की ओर से 1998 में 3411.94 करोड़ का अनुदान भी राज्य सरकार को इस क्षेत्र के विकास के लिए दिया गया था.
राज्य सरकार का कहना है कि इस राहत राशि में से 2379 करोड़ रुपए इस अभावों से जूझती आबादी के विकास के लिए खर्च किए जा चुके हैं.
पर सरकारी आकड़ों में पिछले 10 बरसों की कहानी से परे यहाँ की ज़मीनी सच्चाई कुछ और है.
सरकारी खर्च के आकड़ों में एक तरफ पीने के पानी पर करोड़ों का खर्च है पर लोग झरने और पोखरों का पानी पीकर बीमार पड़े और महामारियाँ फैलीं.
संपर्क मार्गों पर लगभग 600 करोड़ खर्च हो गया पर राज्य सरकार का ही बयान है कि इन क्षेत्रों तक पहुँच पाना संभव नहीं है इसलिए मौत के ये मामले सामने आ रहे हैं.