http://www.bbcchindi.com

शनिवार, 08 सितंबर, 2007 को 18:24 GMT तक के समाचार

भूकंप से बचने में मौलवियों से सहयोग

भारत प्रशासित राज्य जम्मू कश्मीर में भूकंप से बचने के उपायों पर काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक परियोजना में मौलवियों को भी शामिल किया गया है.

इस परियोजना का उद्देश्य लोगों के बीच इस बात की जागरुकता पैदा करना है कि यदि वे एहतियाती क़दम उठा लें तो भूकंप आने पर उनकी जानें बच सकती हैं.

परियोजना के संचालकों का कहना है कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि भूकंप के रुप में ख़ुदा उन्हें सज़ा दे रहा है.

उल्लेखनीय है वर्ष 2005 में आए भूकंप से कश्मीर में 74 हज़ार से अधिक लोगों की जान गई थी और कई गाँव तबाह हो गए थे.

ज़्यादा नुक़सान पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में हुआ था.

कश्मीर भूकंप संभावित क्षेत्र की श्रेणी पाँच के अंतर्गत आता है.

जागरुकता

संयुक्त राष्ट्र ने जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में शहरी क्षेत्रों में भूकंप के चपेट में आने से बचाने के लिए एक परियोजना शुरु की है.

इस परियोजना के संचालक अमीर अली का कहना है, "कश्मीर में लोग भूकंप को लेकर एहतियाती उपाय करने में दिलचस्पी नहीं दिखाते क्योंकि वे इसे नियति मानते हैं."

उनका कहना है, "कश्मीर में 80 से 90 प्रतिशत लोग मानते हैं कि भूकंप या अन्य कोई प्राकृतिक आपदा ख़ुदा का दिया हुआ दंड है."

उन्होंने बताया कि लोगों को इस भावना से उबारने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इमाम और मौलवियों की सहायता लेने की योजना बनाई है.

शनिवार को संयुक्त राष्ट्र की इस विषय पर बुलाए गए सम्मेलन में इमामों और मौलवियों के अलावा वरिष्ठ धार्मिक नेताओं ने भी हिस्सा लिया.

अमीर अली का कहना है, "यदि हम लोगों से कहेंगे कि भूकंप से बचने के एहतियाती उपाय करना इस्लाम के विपरित नहीं है तो वे नहीं मानेंगे इसलिए हम यह संदेश देने के लिए धार्मिक नेताओं की सहायता ले रहे हैं."

उनका कहना है कि एक बार उलेमा लोगों को विश्वास दिला दें कि भूकंप से बचने के उपाय करना ग़ैर-इस्लामिक नहीं है, फिर हम उन्हें बताएँगे कि कौन से एहतियाती क़दम उठाने हैं.

बैठक में हिस्सा लेने वाले वरिष्ठ मुफ़्ती बशीरुद्दीन ने कहा कि इस सम्मेलन से लाभ हुआ है.

उनका कहना था, "यह ठीक है कि सब कुछ ख़ुदा का दिया हुआ है लेकिन ख़ुदा ख़ुद हमसे एहतियाती क़दम उठाने को कहते हैं."

इस कार्यक्रम के तहत संयुक्त राष्ट्र के लोग पहले ही स्कूलों का दौरा कर चुके हैं और बड़ी संख्या में अलग-अलग समूहों में लोगों से मिल चुके हैं.

श्रीनगर के अलावा यह कार्यक्रम भारत के 37 देशों में चलाया जा रहा है.