सोमवार, 03 सितंबर, 2007 को 12:48 GMT तक के समाचार
सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत सरकार के श्रम मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों में हड़तालों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली है.
देश-भर में वर्ष 1998 में कुल 1097 हड़तालें हुईं जिसमें प्रबंधन के लॉकआउट भी शामिल हैं.
यह संख्या वर्ष 1999 में घटकर 927 हो गई और 2001 आते-आते यह 674 पर पहुँच गई.
दिलचस्प बात यह है कि देश में वर्ष 2004 में 477 हड़तालें हुईं पिछले साल केवल 440 हड़तालें आयोजित की गईं.
इस साल के पहले चार महीनों में यानी अप्रैल तक केवल 45 हड़ताल हुईं. इनमें से अधिकतर हड़तालें राजस्थान में हुईं जहाँ वेतन के मुद्दे को लेकर एक निजी कंपनी में प्रबंधन ने तालाबंदी की घोषणा कर दी थी.
अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक का कहना है कि हड़ताल की घटती संख्या भारतीय अर्थव्यवस्था में चल रहे बदलाव से सीधे तौर पर जुड़ा है.
उनका कहना है कि निजी कंपनियों के आने के बाद बैंकिंग और टेलीकॉम जैसे बड़े क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों ने कम हड़तालें कीं.
नए उद्योग
सूचना प्रौद्योगिकी, बीपीओ जैसे क्षेत्रों में कर्मचारियों को संगठित होने के अधिकार नहीं हैं. साथ ही कई नए उद्योगों में कर्मचारियों को ठेके पर रखा जाता है. इस वजह से भी हड़तालें कम हुईं हैं.
पिछले दो वर्षों में अपोलो, एस्कॉर्ट और हीरो हॉंडा जैसे बड़ी कंपनियों में हड़तालें ज़रूर हुईं.
लेकिन मज़दूर यूनियनों से जुड़े श्रमिक नेता मानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के आक्रामक रवैये के चलते श्रमिक हड़ताल करने से घबराते रहे हैं.
साथ ही अदालत द्वारा उद्योगों को कुछ क्षेत्रों में ठेके पर मज़दूर रखने कि इजाज़त देने से भी श्रमिकों के अधिकारों को धक्का लगा है.
मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के मज़दूर संगठन, सीटू के महासचिव तपन सेन मानते हैं कि सरकार उद्योगों के साथ मिलकर मज़दूरों के अधिकार छीन रही है जिस वजह से हड़तालें कम हुईं हैं.
हड़ताल के मुद्दे पर मज़दूर संगठनों और सरकार क रुख़ में अंतर हमेशा बना रहेगा.
सवाल यह है कि क्या हड़ताल की संख्या में कमी का अर्थ यह है कि मज़दूरों के अधिकारों को मान्यता दी जा रही है या उनके विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक तरीकों को ख़त्म या कम किया जा रहा है.