शनिवार, 01 सितंबर, 2007 को 13:15 GMT तक के समाचार
ख़बरें हैं कि छत्तीसगढ़ के ख़ुफ़िया विभाग की एक रिपोर्ट में दंतेवाड़ा में इसी साल मार्च में हुए बड़े नक्सली हमले के लिए पुलिस विभाग को दोषी ठहराया गया है.
गृहमंत्री रामविचार नेताम ने इस तरह की रिपोर्ट की बात तो स्वीकार की है, लेकिन इसमें पुलिस की लापरवाही की बात को स्वीकार नहीं किया है.
हालांकि उन्होंने कहा है कि इस रिपोर्ट में कमियों की ओर इशारा किया गया है और एहतियाती क़दम उठाने के सुझाव दिए गए हैं जिससे ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो.
दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने पुलिस महानिरीक्षक (नक्सल ऑपरेशन और राज्य ख़ुफ़िया विभाग) गिरधारी नायक द्वारा तैयार रिपोर्ट की प्रति हासिल करने का दावा करते हुए कहा है कि रिपोर्ट में इस हमले के पीछे पुलिस विभाग की 'लापरवाही और कायरता' को दोषी ठहराया है.
उल्लेखनीय है कि दंतेवाड़ा ज़िले में 14 मार्च की रात हुए नक्सली हमले में 16 पुलिसकर्मी और 39 एसपीओ मारे गए थे.
रिपोर्ट
ख़बर में रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है कि नक्सली हमले में इतनी संख्या में पुलिसकर्मियों के मारे जाने की मुख्य वजह पुलिस का स्थानीय विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) पर निर्भर रहना था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि एसपीओ उचित तरीके से प्रशिक्षित नहीं होते हैं और इनमें से कई नशे के आदी भी होते हैं.
ख़बर में ये भी कहा गया है कि हमले की रात माझी शंकर, सगाऊ पटेल और केशव सिंह यादव की तैनाती 'वॉचटावर' पर थी, लेकिन जैसे ही नक्सली हमला हुआ ये लोग भागकर पास ही बने समाज कल्याण विभाग के लड़कियों के छात्रावास में भाग गए.
अख़बार लिखता है कि रिपोर्ट में पुलिस सिपाहियों के गोलियाँ चलाने के दावों को विरोधाभासी और ग़लत पाया गया.
ख़बर के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया है कि छह महत्वपूर्ण चौकियों को संभालने का ज़िम्मा नौ एसपीओ को सौंप दिया गया था. जबकि एसपीओ को सिर्फ़ .33 बंदूकें चलाने का औपचारिक प्रशिक्षण भर दिया गया है और किसी मुक़ाबले के लिए उन्हें प्रशिक्षण नहीं दिया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाबलों ने एसपीओ पर ज़रुरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया.
अख़बार के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया है कि जब नक्सलियों ने हमला किया तो वहाँ 22 पुलिस कर्मी और 55 एसपीओ थे और लगभग सभी लोग सो रहे थे. रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी सुरक्षाकर्मी का शव पोस्ट पर नहीं पाया गया बल्कि आउटपोस्ट के आँगन में पाया गया.
रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि सुरक्षाकर्मी तैयार नहीं थे और हमला होने के बाद उन्होंने अँधाधुंध फ़ायरिंग की और हो सकता है कि उनकी गोलियों से उनके कई साथी ही मारे गए हों.
समिति
गृहमंत्री ने रिपोर्ट की बात स्वीकार करते हुए कहा कि दंतेवाड़ा नक्सल हमले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी.
उन्होंने कहा कि समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है लेकिन इसमें हमले कि लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है.
उन्होंने कहा, "इसमें ऐसी कोई बात नहीं है और न ही किसी को दोषी ठहराया गया है."
गृह मंत्री ने कहा कि रिपोर्ट में भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों, क्या कार्ययोजना बनाई जाए, इसके लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं.
नेताम ने माना कि इस रिपोर्ट में कुछ कमियों की ओर इशारा किया गया है.
उन्होंने कहा कि नक्सली हमले में इतनी संख्या में पुलिसकर्मियों के मारे जाने की मुख्य वजह ये थी कि हमले का संदेश तुरंत नहीं पहुँचाया जा सका.
उन्होंने कहा कि इसके अलावा एक रणनीतिक भूल ये भी हुई कि सभी पुलिसकर्मी एक ही कैंप में थे, जबकि वहाँ दो कैंप थे और पुलिसकर्मियों को दोनों कैंपों में रहना था.
नक्सलियों ने इसका फ़ायदा उठाया और जहाँ पहले पुलिसकर्मियों का कैंप था, वहीं से हमला बोल दिया.
उन्होंने कहा कि इसके लिए बटालियन के प्रभारी को निलंबित किया गया.
हमला
जिस पुलिस पोस्ट पर नक्सलवादियों का यह हमला हुआ, उस समय वहाँ कोई 75 सुरक्षाकर्मी मौजूद थे.
यह घटना दंतेवाड़ा ज़िले के बीजापुर क्षेत्र में हुई. रानी बोहली पोस्ट नाम की इस जगह पर रात क़रीब दो बजे नक्सलवादी विद्रोहियों ने बड़ी संख्या में हमला किया.
यह पोस्ट एक स्कूली इमारत में बनाई गई थी जिसमें छत्तीसगढ़ विशेष पुलिस दस्ते के अलावा स्थानीय पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी रह रहे थे.
राज्य के 16 में से आठ ज़िलों में नक्सली विद्रोहियों का प्रभाव माना जाता है.