अमरीका के साथ भारत के परमाणु सहयोग सहमति के बारे में सत्तारूढ़ यूपीए और वामपंथियों के बीच विवाद जहाँ से शुरू हुआ था शनिवार, 25 अगस्त तक वहीं अटका पड़ा नज़र आया.
शुक्रवार रात सोनिया गाँधी अपने दक्षिण अफ़्रीका के दौरे को छोटा करके स्वदेश लौट आईं और फिर शुरू हो गया बैठकों का दौर.
शुक्रवार को ही सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस कोर समिति के लोगों ने मिल बैठकर गुत्थी सुलझाने की कोशिश की.
शनिवार को सरकार के संकट मोचक विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सहयोगी दल डीएमके के मुखिया करुणानिधि से चेन्नई में मुलाक़ात की.
प्रणब ने कुछ अधिक तो नहीं बोला लेकिन इतना ज़रूर कहा कि कांग्रेस यूपीए के सभी घटक दलों से बात कर रही है.
उधर सीपीएम के सीताराम येचुरी ने बताया, “सरकार पर ख़तरा है या नहीं है उसका पता इस बात से लगेगा कि सरकार अंतरराष्ट्रीय परमीणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ बैठक में क्या रुख़ अपनाती है."
"हम चाहते है कि सरकार परमाणु क़रार पर यहीं रुक जाए और सभी पक्षों की तुलना की जाए कि इस क़दम से देश की संप्रभुता और विदेश नीति पर क्या असर पड़ने वाला है. उसके बाद ही कुछ क़दम उठाए जाने चाहिए.”
उन्होंने कहा, “हम कभी नहीं चाहते कि यह सरकार गिरे. हमारा एजेंडा तो यह न्यूक्लिअर डील ही है.”
नाराज़गी भी
सीपीएम के लचीले रुख़ से उसके अपने साथी ही नाराज़ हो गए हैं.
बंगाल में वामपंथी गठबंधन के एक घटक रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के अबनी रॉय कहते हैं, “सीपीएम ने अपने प्रस्ताव में चुनाव का ज़िक्र किया है. हमें उससे क्या मतलब. सब चुनाव से डरते हैं लेकिन अगर चुनाव होने हैं तो होकर रहेंगे.”
अबनी रॉय आगे कहते हैं, "प्रकाश कारत मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हैं और उन्हें अपनी पार्टी में सब बातों ध्यान रखना पड़ता है पर एक हार्डलाइनर होने के नाते उन्होंने जिस तरह की बातें इधर-उधर कही हैं उनके मद्देनज़र वे सिद्धांत के अनुसार निर्णय ले सकते थे."
इसी सबकी वजह से शनिवार को सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत एबी वर्धन से मिले जिनकी पार्टी - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी सरकार से पल्ला झाड़ लेने के पक्ष में है.
अंग्रेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ संपादक दिवाकर ने मौजूदा हालात में बनी सरकार की उहापोह की स्थिति पर कहा, “सरकार के सामने बहुत से विरोधाभास हैं. सरकार बनाए रखने के लिए वामपंथियों का समर्थन ज़रूरी है और साथ ही क़रार को भी बचाना है लेकिन वामपंथी दल इस क़रार का विरोध कर रहे हैं. अगर भारत सरकार एक महीने तक से बात नहीं भी करे तो यह रुख़ क़रार के लिए बहुत जानलेवा नहीं होगा.”