सुनील रमन
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले एक साल में जब-जब भारत सरकार और अमरीकी नेताओं के बीच परमाणु करार के मुद्दे पर कोई चर्चा या औपचारिक घोषणा की गई तो वामपंथी पार्टियों ने मनमोहन सिंह सरकार की आलोचना की.
भारत और अमरीका के बीच परमाणु करार पर सहमति बनने के तुरंत बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीएम) ने आठ पन्ने का एक बयान जारी किया था.
साथ ही सरकार से कहा कि वो इस समझौते पर बन रहे गतिरोध और राजनीतिक पार्टियों के विरोध पर ध्यान दे.
लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए) की अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने इसे अनदेखा कर दिया.
प्रधानमंत्री ने इन नेताओं को बुलाकर इनसे बातचीत करने की जगह बार-बार एक ही बात दोहराई कि यह परमाणु करार देशहित में है और सरकार इस पर समझौता नहीं करेगी.
दबाव
वामपंथी नेताओं द्वारा पिछले दो सप्ताह से सरकार पर दबाव डालने की रणनीति को इस परिपेक्ष्य में देखना ज़रूरी है.
कुछ महीने पहले बीबीसी से बातचीत में सीपीआई महासचिव एबी वर्धन ने साफ किया था कि कांग्रेस नेतृत्व इस भ्रम में है कि भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) विरोधी होने के चलते वामपंथी आँखें बंद करके मनमोहन सिंह को समर्थन देते रहेंगे.
उन्होंने उस समय मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अमरीका सरकार के साथ बढ़ते सैनिक संबंधों पर भी अपना विरोध जताया था.
और यह विरोध सभी वामपंथी नेताओं ने अलग-अलग मंचों पर दोहराया.
आगामी चार-पाँच सितंबर को भारतीय नौसेना अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की नौसेना के साथ बंगाल की खाड़ी में सैनिक अभ्यास करेगी.
वामपंथी नेताओं का कहना है कि उनके विरोध के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार अमरीका के साथ आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक क्षेत्र में संबंध बढ़ा रही है.
अमरीका के साथ बातचीत जारी रखने में यूपीए सरकार ने जिस तरह ज़ल्दबाज़ी दिखाई वो शायद पुरानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) सरकार से बहुत अलग नहीं.
अगर एनडीए सरकार और यूपीए सरकार में बहुत बड़ा अंतर है तो यह है कि वामपंथियों की मौजूदगी जिनकी विचारधारा और अमरीका के प्रति दृष्टिकोण कभी भी बदला नहीं.
स्थिरता
अमरीका के प्रति वामपंथियों का विरोध बढ़ा ही है.
अगर आज यूपीए सरकार की स्थिरता को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो उसके लिए कांग्रेस नेता बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं.
पिछले महीनों में कांग्रेस नेतृत्व की ओर से वामपंथियों की चिंताओं को दूर करने के लिए शायद ही कोई कोशिश की गई है.
अमरीका के साथ संबंध बढ़ाने के लिए जो सक्रियता और उत्साह दिखाया गया उससे यह लगता है कि या तो कांग्रेस नेताओं ने वामपंथियों से पल्ला झाड़ने का मन बना लिया है या सरकार और कांग्रेस नेतृत्व ने यह मान लिया है कि वामपंथी सांसदों के सामने कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
सच यह है कि कांग्रेस नेतृत्व ने 1996 से 1998 तक चली संयुक्त मोर्चा सरकार के अनुभवों से कोई सीख नहीं ली.
उस समय वामपंथियों का एक तबका सरकार में शामिल हुआ था लेकिन वामपंथियों ने संयुक्त मोर्चा सरकार की नीतियों से लगातार विरोध जताया और उसकी कई नीतियों में बदलाव करवाया.
इस समय वामपंथी अमरीका का मुद्दा उठाकर उत्तरी केरल के मुसलमान बहुल इलाक़े में समर्थन जुटाने की कोशिश करेगा.
केरल से एक वामपंथी नेता ने कहा कि केंद्र में वामपंथी न अभी सत्ता में हैं और न अगले चुनाव के बाद होने वाले हैं- इसलिए उन्हें ख़ास फर्क नहीं पड़ता.
इस पूरे घटनाक्रम में वामपंथी अपनी रणनीति के अनुसार चल रहे हैं. अगर कहीं दुविधा है तो वो यूपीए सरकार और कांग्रेसी खेमे में है.