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गुरुवार, 23 अगस्त, 2007 को 04:28 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता,जयपुर

गूजरों ने फिर आंदोलन की चेतावनी दी

राजस्थान में गूजरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की माँग पर गठित चोपड़ा आयोग का कहना है कि निर्धारित तीन माह में रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकेगी.

जस्टिस जसराज चोपड़ा की अध्यक्षता में गठित आयोग का कार्यकाल 12 सितंबर को ख़त्म हो रहा है.

इसी साल मई में गूजरों ने अनुसूचित जनजाति के तहत मिलने वाली आरक्षण सुविधा दिए जाने की माँग पर राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया था जिसने हिंसक रूप ले लिया और लगभग 24 लोगों की जानें गईं थी.

गूजर नेताओं से बातचीत के बाद राज्य सरकार ने चोपड़ा आयोग का गठन कया था.

गूजर समुदाय का कहना है कि अब वे सरकार को और मोहलत नहीं देंगे. गूजरों ने 26 अगस्त को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के विधानसभा क्षेत्र झालवाड़ में महापंचायत बुलाई है.

जस्टिस चोपड़ा का कहना है कि गूजरों के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी जुटाना कठिन साबित हो रहा है क्योंकि 1931 में हुई जनगणना के बाद इस समुदाय के बारे में कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है.

वो कहते हैं, "हमें परस्पर विरोधाभासी जानकारीयाँ मिल रही हैं. एक पक्ष का कहना है कि अभी गूजरों की आबादी 35 लाख है तो कोई दूसरा पक्ष यह संख्या 65 लाख होने का दावा कर रहा है."

अध्ययन

आयोग ने नमूने के तौर पर 105 गूजर बहुल गाँवों का निरीक्षण किया है लेकिन इतना ही काफी नहीं है.

पिछले ढ़ाई महीने से आयोग लगातार सुनवाई कर रहा है और इस दौरान उसे 35 हज़ार शपथ पत्र और लगभग 14 हज़ार ज्ञापन मिले हैं. आयोग का कहना है कि इन दस्तावेज़ों का अध्ययन करने में और समय लगेगा.

जस्टिस चोपड़ा कहते हैं, "ऐसा माना जा रहा है कि 17-18 ज़िलों में गूजरों की आबादी अधिक है. अगर हर ज़िले के अध्ययन में दो-तीन दिन का भी समय देते हैं तो भी काफ़ी समय लगेगा."

चेतावनी

गूजरों के नेता प्रहलाद गुंजल ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अब और मोहलत देने का सवाल ही नहीं उठता है.

वो कहते हैं, "हमनें तीन महीने तीन दिन का समय दिया. अब एक दिन भी और नहीं देंगे. जब जाटों को आरक्षण देना था तो कौन सी रिपोर्ट बनी थी. राज्य सरकार ने गूजरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर कई अध्ययन कराए हैं. उन्हीं को आधार मान लें."

गुंजल का कहना है कि इस तरह के फ़ैसले राजनीतिक इच्छाशक्ति से होते हैं, इसलिए अब और समय नहीं दिया जाएगा.

गूजरों के कड़े तेवर को देखते हुए आदिवासी समुदाय भी संगठित हो रहा है और ऐसी आशंका जताई जा रही है कि फिर से तनाव उत्पन्न हो सकता है.