गुरुवार, 09 अगस्त, 2007 को 12:32 GMT तक के समाचार
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में कबायली नेताओं का सम्मलेन यानी लोया जिरगा शुरू हो गया है. सम्मेलन में तालेबान से लड़ने की रणनीति पर चर्चा होगी.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को भी इस तीन दिवसीय सम्मेलन में हिस्सा लेना था, लेकिन वह किन्हीं वजहों से इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने सम्मेलन का उदघाटन करते हुए कहा कि सम्मेलन दोनो पड़ोसियों को नज़दीक लाएगा.
चरमपंथ के मुद्दे पर बात करने के लिए जिरगा में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के करीब 700 क़बायली नेताओं, मौलवियों और नेताओं को आमंत्रित किया गया है.
तालेबान को इसमें शामिल नहीं किया गया है. तालेबान ने प्रतिनिधियों से इस जिरगा के बहिष्कार का आहवान किया है.
पाकिस्तान के उत्तर और दक्षिणी वज़ीरिस्तान के क़बायली नेताओं ने भी सम्मेलन में आने का निमंत्रण ठुकरा दिया है.
निराशा
करज़ई ने अपने संबोधन में कहा, "हमें बहुत गर्व है कि यह शांति जिरगा दो देशों, दो भाइयों और दो पड़ोसियों को पास लाया है."
उनका कहना था, "मुझे विश्वास है अगर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दोनों अपने हाथ मिला लें तो हम एक दिन में ही दोनों देशों के ख़िलफ़ हो रहे दमन को दूर कर सकते हैं".
उन्होंने कहा, "इसमें शक नहीं होना चाहिए कि ये जिरगा सफल होगा."
राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने अपनी जगह प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ को सम्मेलन में भेजा है और राष्ट्रपति करज़ई को 'पूर्ण समर्थन' का भरोसा दिलाया है.
अफ़ग़ानिस्तान सरकार का कहना है कि मुशर्रफ़ का न आना निराशाजनक है.
करज़ई के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने सम्मेलन में लोगों को शामिल होने के लिए राज़ी करने में अहम भूमिका निभाई है.
उन्होंने इस बात से इनकार किया कि मुशर्रफ़ के नहीं आने से जिरगा का महत्व कम होगा.
वजह
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हो सकता है कि मुशर्रफ़ ने सम्मेलन में न जाने का फ़ैसला अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के उस बयान के बाद लिया हो, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' में विफल रहा है.
हालाँकि अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता सीन मैककोरमैक ने मुशर्रफ़ के सम्मेलन में किसी भी दिन हिस्सा लेने की संभावना से इनकार नहीं किया है.
चरमपंथी हिंसा से निपटने के उपाय तलाशने के लिए इस जिरगा का आयोजन किया गया है और इसमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुख्य भूमिका रही है.
बुश की मंशा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को एक मंच पर लाना था ताकि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जारी चरमपंथी हिंसा से निपटा जा सके.
जिरगा
जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें सभी पख़्तून, ताजिक, हज़ारा और उज़्बेक कबायली नेता एक साथ बैठते हैं, इनमें शिया और सुन्नी दोनों शामिल होते हैं. यहाँ देश के मामलों पर विचार विमर्श कर फ़ैसले लिए जाते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान संयुक्त शांति जिरगा का विचार अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने अमरीकी राष्ट्रपति बुश के साथ पिछले दिनों हुई मुलाकात में दिया था.
हामिद करज़ई का कहना था कि वे जिरगा को सीमा के दोनों ओर पश्तून समाज को दोबारा शुरु करने की कोशिश मानते हैं ताकि तालेबान के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके.
तालेबान के समर्थकों का कहना है कि उनके बगैर की गई बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं होगा.
पाकिस्तान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के महासचिव अब्दुल गफ़ूर हैदरी ने एपी को कहा, "ये सिर्फ़ दिखावा है, ये अफ़गान लोगों के असल विचार नहीं दर्शाता."
बीबीसी के बिलाल सरवरी का कहना है कि काबुल में जिरगा को लेकर लोगों को कुछ उम्मीदें हैं. उन्होंने बताया कि काबुल में पाकिस्तानी झंडों का दिखना असामान्य सी बात है क्योंकि दोनों देश के बीच संबंध अच्छे नहीं है.