शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 08:13 GMT तक के समाचार
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भारत-अमरीका परमाणु सहमति का मसौदा सार्वजनिक किया जिसमें भारत को बिना विघ्न परमाणु ईंधन की सप्लाई के आश्वासन को अमरीका के परमाणु ऊर्जा क़ानून के खंड 123 में शामिल करने की बात है.
ग़ौरतलब है कि बुश प्रशासन को ऐसे प्रावधान को अमरीकी संसद यानि कांग्रेस के समक्ष रखना होगा.
असैनिक मकसदों के लिए 40 साल की अवधि वाली भारत-अमरीका परमाणु सहमति असैनिक गतिविधियों - विशेष तौर पर ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित है. इसके बाद इसे अगले हर दस साल की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा.
इसके तहत भारत असैनिक कार्यों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीकी जानकारी अमरीका और परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों से पा सकेगा.
इसके बदले में भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने असैनिक परमाणु केंद्रों का निरीक्षण करने की इजाज़त देनी होगी.
ईंधन का भंडार
जुलाई 2005 के भारत-अमरीका संयुक्त बयान के अनुसार भारत को असैनिक कार्यों के लिए इस्तेमाल हो रहे रियक्टरों के लिए ईंधन का पूरा आश्वासन दिया गया है.
इस सहमति के तहत दोनो देश परमाणु सामग्री, उपकरण और तकनीक के बारे में जानकारी एक दूसरे को प्रदान कर सकेंगे.
ये भी प्रावधान है कि विशेष तौर पर भारत के लिए परमाणु ईंधन की सप्लाई के बारे में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ सहमति बनाने में अमरीका भारत के साथ सहयोग करेगा.
इसी दिशा में अमरीका भारत को एक परमाणु ईंधन का रणनीतिक भंडार बनाने में भी मदद करेगा और यदि सप्लाई में विघ्न आता तो परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों बैठक कर मुद्दा सुलझाने की कोशिश करेगा.
भारत यूरेनियम आईसोटोप-235 का 20 प्रतिशत तक संवर्द्धन कर पाएगा. लेकिन उसे एक विशेष राष्ट्रीय केंद्र स्थापित करना होगा जहाँ आईएईए के नियमों का पालन होगा.
'दख़ल नहीं'
इस सहमति में प्रावधान है कि इसका इस्तेमाल अनुचित व्यापारिक या औद्योगिक लाभ या फिर एक दूसरे के वाणिज्य और औद्योगिक हितों में बाधा डालने के लिए नहीं हो सकता.
इस सहमति का इस्तेमाल दूसरे देश की शांतिपूर्ण परमाणु नीति या कार्यक्रम या फिर शोध में दख़ल देने के लिए भी नहीं हो सकता.
दोनो में से किसी भी देश को अधिकार होगा कि वह इस सहमति की अवधि समाप्त होने से पहले एक साल का लिखित नोटिस देकर और कारण बताकर इसे रद्द कर सकता है.