http://www.bbcchindi.com

शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 13:32 GMT तक के समाचार

राम दत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में होगी 'ठेके पर खेती'

उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी सरकार ने राज्य में विवादास्पद ठेके पर खेती यानी कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग कराए जाने को हरी झंडी दे दी है.

राज्य की राजधानी लखनऊ में हुई मंत्रिमंडल बैठक में यह फ़ैसला किया गया.

सरकार ने साथ ही ज़मीन हदबंदी क़ानूनों में सुधार करने का भी फ़ैसला किया है. अब लोग साढ़े बारह एकड़ से भी अधिक ज़मीन पर मालिकाना हक़ रख सकेंगे.

बैठक के बाद मुख्यमंत्री मायावती ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में राज्य की नई कृषि नीति की घोषणा की.

उन्होंने कहा इस नीति के लागू होने के बाद कृषि में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भारी बदलाव आएगा और लोगों को रोज़गार के अवसर मिलेंगे.

मायावती ने कहा, “वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए खुदरा बाज़ार क्रांति को ध्यान में रखते हुए नई नीति बनाई गई है. इससे राज्य मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़ सकेगा.”

उन्होंने बताया कि नई नीति में कृषि उत्पादन मंडी अधिनियम में संशोधन किया गया है. अब निजी कंपनियाँ संयुक्त क्षेत्र में मंडी स्थापित कर सीधे किसानों से ख़रीदारी कर सकेंगी.

उत्तर प्रदेश में तीन-चौथाई से अधिक किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम ज़मीन है. ये किसान मुख्यतः अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए खाद्यान्न पैदा करते हैं.

फ़ायदा

इन किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधाओं, गुणवत्ता वाले बीजों की बहुत ज़रूरत है. छोटे किसानों को इस नीति से कोई फ़ायदा होने की उम्मीद नहीं है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के दूसरों राज्यों में हुए कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग के प्रयोग बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं.

गिरी विकास अध्ययन संस्थान में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर का कहना है कि पंजाब और कर्नाटक जैसे राज्यों में कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग का प्रयोग असफल हो चुका है. इससे रोज़गार में भी कमी होती है.

प्रोफ़ेसर दिवाकर ने कहते हैं, “उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग से सिर्फ़ आत्महत्याएँ बढ़ेंगी. इस नीति से मुझे बहुत निराशा हुई है क्योंकि बसपा सरकार से उम्मीद थी कि वह भूमि सुधार क़ानूनों को मज़बूत करके ग़रीबों और दलितों के हित में काम करेगी.”

व्यावसायिक खेती की वजह से खेती का लागत मूल्य बढ़ जाता है जिसके परिणाम स्वरूप कई राज्यों में किसान आत्महत्या की घटनाएँ सामने आई हैं.

कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग एक अमरीकी अवधारणा है. इसके तहत किसान कंपनी की ज़रूरत के हिसाब से पैदावार करते हैं.

कुछ बहुराष्ट्रीय और कृषि-व्यवसाय से जुड़ी कंपनियाँ कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग की वकालत करती हैं. छोटे किसानों के संगठन कॉन्ट्रेक्ट फ़ॉर्मिंग का विरोध करते हैं.