बुधवार, 01 अगस्त, 2007 को 12:05 GMT तक के समाचार
भारत के लगभग सभी अख़बारों ने मुंबई बम विस्फोटों में 'आर्म्स एक्ट' के दोषी सिने अभिनेता संजय दत्त को छह साल की क़ैद की ख़बर को प्रमुखता से छापा है.
कई अख़बारों ने इस ख़बर पर संपादकीय भी लिखे हैं.
दैनिक जागरण का शीर्षक है- माफ़ी न बेल, छह साल की जेल
अख़बार लिखता है कि संजय दत्त उर्फ़ मुन्नाभाई को मुंबई ब्लास्ट केस में सज़ा हो ही गई और जेल के बाहर की खुली हवा में सांस लेने का उनका सपना चकनाचूर हो गया.
अख़बार ने इस पर 'देर से ही सही' शीर्षक से संपादकीय भी लिखा है. अख़बार लिखता है कि यह फ़ैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है. पहले यह कि विश्व में अपनी तरह की पहली व्यापक आतंकी वारदात की सुनवाई ने एक रिकॉर्ड बनाया, दूसरे बम विस्फोटों की साजिश के सरगना के हाथ न आने के बावजूद कई अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा सुनाई गई.
नवभारत टाइम्स का शीर्षक है- नायक नहीं ख़लनायक है तू
अख़बार लिखता है कि न दुआएँ काम आईं और न बड़ों-बड़ों के पेटीशन.
अख़बार ने फ़ैसले के बाद संजय दत्त और जज पीडी कोडे की बातचीत को बॉक्स में छापा है.
इसके अनुसार संजय ने कहा- सर मैने 14 साल पहले एक गलती की थी, प्लीज मुझे सरेंडर करने के लिए कुछ वक़्त दीजिए. मैं बहुत थक गया हूँ, मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए.
जवाब में कोडे ने कहा-आप हमेशा फ़िल्मों में नंबर वन रहे हैं. मुझे आपकी अदाकारी बेहद पसंद है. आपको खुद से भरोसा नहीं खोना चाहिए.
अख़बार अपने संपादकीय में लिखता है कि संजय दत्त की सज़ा पर टिप्पणी करते हुए आप यह नहीं कह सकते कि यह ग़लत हुआ है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया का शीर्षक है- दत्त होप्स हिट फ़ोर सिक्स
अख़बार लिखता है कि संजय दत्त को 12 साल बाद फिर जेल भेज दिया गया.
पंजाब केसरी का शीर्षक है- मुन्ना भाई 6 साल के लिए सलाखों के पीछे
अख़बार अपने संपादकीय में लिखता है कि जिन लोगों को सज़ाएँ हुई हैं, वे और उनके परिवार वाले न्यायाधीश को बुरा-भला कह सकते हैं, लेकिन न्यायाधीश कोडे ने न्याय को सामने रखकर ही निष्पक्षता से फ़ैसले सुनाए.
अमर उजाला का शीर्षक है- सुप्रीम कोर्ट का ही आसरा
समाचार पत्र ने ख़बर लगाई है कि 12 साल बाद आखिरकार इंसाफ़ की घड़ी आई तो संजय दत्त के साथ क़ानून ने कोई रियायत नहीं बरती.
राष्ट्रीय सहारा का शीर्षक है- भाईगीरी ने पहुँचाया मुन्ना को जेल
अख़बार लिखता है कि संजय को सज़ा होने से सबसे ज़्यादा दुखी वे फ़िल्म निर्माता हैं, जिनकी फ़िल्में लटक जाने से उन्हें तकरीबन 100 करोड़ रुपए का नुक़सान होगा.