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सोमवार, 30 जुलाई, 2007 को 11:57 GMT तक के समाचार

जवाहिर
दलित व्यक्ति, पटना की एक हरिजन बस्ती से

कल भी हम झोपड़ी में थे, आज भी...

साठ साल पहले आज़ादी मिली और साठ साल पहले ही मेरा जन्म हुआ. तब मुझे पता नहीं था कि भारत में अग्रेज़ों का राज था. यह तो बाद में मालूम हुआ जब मैं बड़ा हुआ. पता चला कि अंग्रेज़ भारत छोड़कर भाग गए हैं और देश में अब अपना राज है.

बचपन में पढ़ाई ही नहीं कर सके क्योंकि स्कूल थे ही नहीं. बाद में स्कूल खुले भी लेकिन 10-12 साल की उम्र से ही हम कमाने-खाने में लग गए. मज़दूरी करने लगे. सोचते थे कि पढ़-लिखकर क्या करेंगे?

आज दलितों के लिए नौकरी में आरक्षण है लेकिन दलित पढे-लिखे नहीं हैं. सौ में से कोई पाँच दलित ही साक्षर हैं और जो साक्षर हैं वे दौड़-धूप कर रहे हैं. इसके बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रहीं.

(भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए पिछले 60 बरसों के दौरान भारत में दलितों की स्थिति पर पटना के एक 60 वर्षीय दलित व्यक्ति की राय और दीजिए अपनी प्रतिक्रिया...)

दलितों के लिए आरक्षण होना या न होना सब एक बराबर है. दलितों को रोज़गार मिलें तो दलितों का भला हो.

इस आज़ादी से दलितों को कोई लाभ नहीं मिला. जो पहले राजा था, आज भी राजा है और जो ग़रीब था, वो और भी ग़रीब हो गया है.

भारत की आज़ादी के छह दशक बाद दलितों की स्थिति पर एक दलित की राय आपने पढ़ी. क्या सोचते हैं आप इस बारे में, अपनी प्रतिक्रियाएँ देने और पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आज दलित बस्तियों में रहने वाले नक्सली बन जाते हैं. ऊँची जातियों के लोग दलितों की बहूँ-बेटियों का शोषण करते हैं. ऐसे में दलित भी सोचता है कि इन्हें मारना चाहिए. इसके अलावा कोई रास्ता ही नहीं है.

मायावती, रामविलास पासवान दलितों के नेता हैं. लेकिन वे अमीर लोग हैं. दलितों के नेता तो बन गए लेकिन दलितों का काम कोई नहीं करता. सिर्फ़ नाम के लिए दलितों के नेता हैं.

देशः तब और अब

तब मज़दूरी से सवा रुपए मिलते थे और उससे गुज़ारा भी हो जाता था. एक रूपए में पाँच-छह सेर चावल मिल जाता था. चार-पाँच रूपए सेर में आटा आता था. दाल सवा रूपए सेर थी. कड़ुवा तेल भी सिर्फ डेढ़ रूपए सेर था.

उस समय एक आदमी कमाता था तो चार-पाँच लोग बैठकर खा पाते थे, आज तो पाँचों कमा रहे हों तब भी पूरा नहीं पड़ता.

शुरुआती दौर काफ़ी अच्छा था. 1964 में नेहरू जी का निधन हो गया. उनके बाद लालबहादुर शास्त्री जी आए. केवल 18 महीने के समय में जो काम शास्त्री जी ने कर दिखाया, वह आज के नेता 18 युगों में भी नहीं कर सकते हैं.

इसके बाद देश में इतनी सरकारें आईं और चली गईं लेकिन किसी ने भी दलितों के लिए कुछ नहीं किया. कहतें सब हैं, लेकिन कोई कुछ नहीं करता.

चुनाव के समय सब आते हैं. कहते हैं कि चुनाव जीतने के बाद सबका कल्याण कर देंगे लेकिन जीतने के बाद कोई मुँह तक नहीं दिखाता.

कोई देखने तक नहीं आता कि यहाँ क्या हुआ, क्या हो रहा है. कौन मर रहा है, कौन जी रहा है, किसने पास घर है, किसके पास घर नहीं है. हम कल भी झोपड़ी में रहते थे और आज भी झोपड़ी में ही रहते हैं. सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है.

सरकार अगर हम ग़रीब दलितों को छोटे-छोटे मकान बनाकर दे दे तो अच्छा रहे.

(बीबीसी संवाददाता मणिकांत ठाकुर से बातचीत पर आधारित)