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शनिवार, 28 जुलाई, 2007 को 20:43 GMT तक के समाचार

अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

'ग़ैर-कश्मीरी' पर नरम पड़े गिलानी

भारत प्रशासित कश्मीर के एक प्रमुख अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का रुख़ ग़ैर कश्मीरी मज़दूरों और कलाकारों के प्रति कुछ नरम हुआ दिखता है.

पहले उन्होंने सारे ग़ैर कश्मीरी लोगों को घाटी से चले जाने को कहा था लेकिन अब उन्होंने कहा कि ग़ैर कश्मीरियों में जो अपराधी हैं उन्हें कश्मीर से निकाल देना चाहिए.

उनका आरोप था कि ये लोग भारतीय सेना के कहने पर कश्मीर में शराबख़ोरी और इसी तरह के दूसरे दुराचारों को बढ़ावा दे रहे हैं.

पिछले हफ़्ते हंदवाड़ा में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी और ग़ैर-कश्मीरी मज़दूरों के ख़िलाफ़ गिलानी का बयान इसके बाद आया था.

उन्होंने कहा था ये लोग ऐसे समाज से आते हैं जहाँ शराबख़ोरी, अनैतिकता और दूसरे ग़लत काम बहुतायत से होते हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि सेना के लोग इन्हें शराब देते हैं जिससे कि वे कश्मीरी युवाओं को शराबख़ोरी और दूसरे दुराचारों में लगा सकें.

उल्लेखनीय है कि भारत प्रशासित राज्य जम्मू कश्मीर में दूसरे राज्यों से हज़ारों लोग रोज़गार कमाने के लिए गए हुए हैं.

नरम रुख़

गिलानी ने शनिवार को अपना रुख़ में नरमी लाते हुए कहा है कि ग़ैर कश्मीरियों में जो अपराधी हैं उन्हें घाटी छोड़कर जाने के लिए कहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि ग़ैर कश्मीरियों के बीच अपराधियों को वापस जाने का एक सम्मानजनक रास्ता देना चाहिए.

उनका कहना था, "यदि मस्जिदों के इमामों को अपने आसपड़ोस में रह रहे ग़ैर कश्मीरियों के व्यवहार से कोई शिकायत नहीं है और यदि फ़ैक्टरियों के मालिकों को अपने यहाँ काम करने वाले ग़ैर कश्मीरियों के चरित्र पर कोई आपत्ति नहीं है तो उन्हें बख़्शा जा सकता है."

अलगाववादी नेता गिलानी ने ग़ैर कश्मीरियों को घाटी छोड़ने के लिए दी गई चरमपंथी गुट हिज़बुल मुजाहिदीन की एक हफ़्ते की समय सीमा पर भी असहमति ज़ाहिर की.

उनका कहना था, "यह सामाजिक समस्या है और इसे तार्किक ढंग से निपटाया जा सकता है, हिज़बुल की बयान अनावश्यक है."

शनिवार को गिलानी ने इस ख़बरों पर भी नाराज़गी जताई कि कुछ स्थानीय लोगों ने ग़ैर कश्मीरी लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें बकाया रकम देने से भी इनकार कर दिया.

ग़ैर कश्मीरियों का एक दल शनिवार को गिलानी से मिलने पहुँचा था.

वहीं चरमपंथियों की समय सीमा को देखते हुए हज़ारों ग़ैर कश्मीरी मज़दूर घाटी छोड़कर जा चुके हैं.

सस्ते मज़दूर

उल्लेखनीय है कि भारत प्रशासित कश्मीर में बिहार, उत्तरप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से हज़ारों लोग हैं जो बढ़ई, राजमिस्त्री, नाई का काम करते हैं और बड़ी संख्या में लोग मज़दूरी करते हैं.

चूँकि कश्मीर के स्थानीय निवासी सरकारी और दूसरी नौकरियों में रुचि लेने लगे हैं इसलिए इस तरह के कामों के लिए दूसरे राज्यों के लोगों की ज़रुरत पड़ने लगी है.

यहाँ तक कि ये लोग सीमा के संवेदनशील इलाक़ों में भी काम कर रहे हैं.

एक ओर तो कश्मीरियों को सस्ते मज़दूर भी चाहिए लेकिन दूसरी ओर उनके भीतर यह डर भी समा रहा है कि इससे कही घाटी की जनसंख्या की तस्वीर न बदल जाए.

इसी तरह की आशंका जताते हुए रेज़ीडेंसी रोड के एक दूकानदार रफ़ी अहमद कहते हैं, "उनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और एक दिन ऐसा आएगा जब उनकी संख्या हम कश्मीरियों से अधिक हो जाएगी."

श्रीनगर के आईजी पुलिस एसएम सहाय का कहना है कि यदि गिलानी के बयान से कोई भड़कता है तो इसका दोष उनपर ही होगा.

लेकिन गिलानी की इस अपील से बेख़बर ग़ैर-कश्मीरी मज़दूर अपने कामकाज में लगे हुए हैं.