तालेबान कमांडर अब्दुल्लाह मैहसूद ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि उन्हें पाकिस्तानी सैनिकों ने मारा था- ये कहना है उस घर के मालिक का, जहाँ मेहसूद की मौत हो गई थी.
शेख़ आलम मंदोख़ेल के मुताबिक़ अब्दुल्लाह मैहसूद को पेट में गोली मारी गई थी. पाकिस्तान की पुलिस ने दावा किया था कि गिरफ़्तारी से बचने के लिए मैहसूद ने अपने आप को उड़ा लिया.
ये घटना बलूचिस्तान प्रांत की है. वर्ष 2001 में तालेबान नेता अब्दुल्लाह मैहसूद को गिरफ़्तार कर अमरीका के हवाले कर दिया गया था और उन्हें ग्वांतानामो में रखा गया था लेकिन फिर उन्हें रिहा कर दिया गया.
इसके बाद मैहसूद पाकिस्तान के सबसे चर्चित इस्लामिक चरमपंथी नेताओं में शामिल हो गए, जिनकी पाकिस्तान को तलाश थी. गुरुवार को मैहसूद को दक्षिणी वज़ीरिस्तान के उनके गाँव में दफ़ना दिया गया.
शेख़ आलम ने बीबीसी उर्दू सेवा को बताया कि सोमवार की रात मैहसूद उनके घर में आए थे. उन्होंने बताया कि उस समय ना तो वे और ना ही उनके चचेरे भाई शेख़ अयूब मंदोख़ेल ही वहाँ थे.
दावा
शेख़ आलम के मुताबिक़ जब एक लड़के ने घर का दरवाज़ा खोला तो मैहसूद और उनके साथ आए लोगों ने कहा कि वे यहाँ रात बिताने आए हैं और उन्हें मौलवी शेख़ आलम ने भेजा है.
लड़के ने उन्हें अतिथि कक्ष में ठहराया, रात का खाना दिया और फिर अपने कमरे में चला गया. शेख़ आलम ने बताया, "हम शहरों से या गाँवों से आए लोगों को अतिथि की तरह रखते हैं. कई मौक़े पर हमारे यहाँ सरकारी और ख़ुफ़िया अधिकारी भी आए हैं. ये हमारी पख़्तून परंपरा है."
शेख़ आलम ने बताया कि दूसरे दिन सुबह साढ़े पाँच बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई और एक अन्य लड़के ने दरवाज़ा खोला. वहाँ सुरक्षाकर्मी मौजूद थे. उन्होंने उस लड़के को गिरफ़्तार कर लिया और घर को चारो ओर से घेर लिया.
लड़के के पिताजी भी सुरक्षाकर्मियों ने गिरफ़्तार कर लिया. शेख़ आलम के मुताबिक़ उसके बाद हुई भारी गोलीबारी में मैहसूद मारे गए. उन्होंने बताया, "अगर उन्होंने अपने आप को उड़ाया होता, तो उनके शरीर के टुकड़े हो गए होते लेकिन उन्हें सिर्फ़ पेट में गोली लगी थी."
शेख़ आलम के मुताबिक़ पहली बार मैहसूद उनके यहाँ आए थे. इसके पहले कभी भी उन्होंने वहाँ रात नहीं बिताई थी.
लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों का बयान शेख़ आलम के दावे से बिल्कुल उलट है. पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के मुताबिक़ मैहसूद की गतिविधियों पर तीन दिनों से नज़र रखी जा रही थी.
अधिकारियों के मुताबिक़ गिरफ़्तारी से बचने के लिए मैहसूद ने अपने आप को ग्रेनेड से उड़ा लिया. बीबीसी संवाददाताओं के मुताबिक़ तालेबान समर्थक चरमपंथियों में मेहसूद काफ़ी ख़तरनाक माने जाते थे.
अब्दुल्लाह मैहसूद का असली नाम नूर आलम था और वे पख़्तून थे. वर्ष 1996 में अफ़ग़ानिस्तान में हुई लड़ाई के दौरान एक धमाके में उनका एक पैर उड़ गया था. वर्ष 2001 में उन्हें पकड़ा गया और फिर अमरीका के हवाले कर दिया गया.
लेकिन वर्ष 2004 में उन्हें ग्वांतानामो से छोड़ दिया गया. जिसके बाद वे एक बार फिर चरमपंथी गतिविधियों में शामिल हो गए.