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मंगलवार, 24 जुलाई, 2007 को 10:21 GMT तक के समाचार

तालेबान कमांडर ने ख़ुद अपनी जान ली

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक इस्लामी चरमपंथी कमांडर ने गिरफ़्तारी से बचने के लिए ख़ुद अपनी जान ले ली है.

अब्दुल्लाह मैहसूद जिनका असली नाम नूर आलम था, ग्वांतानामो बे बंदी शिविर में दो साल से ज़्यादा समय गुज़ार चुके थे.

उन पर पाकिस्तान में वर्ष 2004 में दो चीनी इंजीनियरों को बंधक बनाने का आरोप था और पुलिस को उनकी तलाश थी.

मैहसूद पश्तून थे और अफ़ग़ानिस्तान के तालेबान भी इसी जाति के हैं.

उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में उत्तरी गठबंधन के ख़िलाफ़ तालेबान की तरफ़ से लड़ाई में भी हिस्सा लिया था.

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता जावेद चीमा का कहना है कि जब सैनिकों ने अब्दुल्लाह मैहसूद के ज़ोब ज़िले में स्थित ठिकाने पर हमला किया तो उन्होंने ख़ुद को हथगोले का विस्फोट कर उड़ा दिया.

चीमा का कहना था, "जब सैनिकों ने अब्दुल्लाह मैहसूद के छिपने के ठिकाने पर धावा बोला था, मैहसूद के तीन साथी गिरफ़्तार कर लिए गए हैं".

एक स्थानीय पुलिस अधिकारी अता मोहम्मद ने एक समाचार एजेंसी को बताया कि इस विस्फोट में कोई सैन्य कर्मचारी घायल नहीं हुआ है.

निर्भय और निर्भीक

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता डैन इसाक़ का कहना है कि मैहसूद एक महत्वपूर्ण शख़्सियत थे और इसका कारण यह नहीं है कि वह हाल के दिनों में अधिक सक्रिय रहे, बल्कि यह कि तालेबान समर्थक चरमपंथियों में उनकी छवि एक निडर व्यक्ति की थी.

वर्ष 1996 में जब तालेबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा करने की लड़ाई लड़ी तो बारूदी सुरंग के एक विस्फोट में उनकी एक टांग जाती रही. 2001 में वह पकड़ में आए और अमरीकियों के हवाले कर दिए गए.

ग्वांतानामो बे से उनकी रिहाई 2004 में हुई और उसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी चरमपंथी गतिविधियों की पुनः शुरुआत कर दी.

मैहसूद की जिन दो चीनी इंजीनियरों के अपहरण के मामले में तलाश थी उनमें से एक की 2004 में दक्षिणी वज़ीरिस्तान में हत्या कर दी गई थी.

विश्लेषकों का कहना है कि यह अपहरण अल क़ायदा के चरमपंथियों को छुड़ाने के लिए किया गया था.

ग्वांतानामो बे से लौटने के बाद अब्दुल्लाह मैहसूद अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीका विरोधी लड़ाकों के हीरो बन गए थे.