अविनाश दत्त
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
एपीजे अब्दुल कलाम ने पाँच साल पहले 25 जुलाई, 2002 को भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी.
शनिवार को एक पत्रकार वार्ता में एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था, "मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ. मैं भारत के एक अरब लोगों के साथ ही रहूँगा."
यह जवाब और इसकी सच्चाई में ही कुछ ऐसी बात है जो कलाम को एक अलग रुतबा देती है.
पाँच साल पहले जब अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्रपति बने तो राजनीतिक पंडितों ने उनकी उम्मीदवारी और जीत के पीछे अलग-अलग कयास लगाए थे.
किसी ने इसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) का गुजरात दंगों के बाद उठाया गया कदम माना तो किसी को यह चिंता सता रही थी कि कहीं कलाम एनडीए की रबर स्टैंप न बन जाएँ.
अख़बार उनके फ़िल्मी सितारों जैसे बालों पर टिप्पणियाँ कर रहे थे तो आम जनता आश्चर्यचकित थी.
कार्यकाल
लेकिन पाँच साल बाद जब अब्दुल कलाम राष्ट्रपति पद का अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं तो चर्चा का विषय कुछ और ही हैं.
आज बात हो रही है उनकी सादगी की, सच्चाई की और राजसी शानो-शौकत वाले राष्ट्रपति भवन को आम आदमी के लिए खोल देने की.
आज 'कलाम कट' की चर्चा आम है और एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रनायक बन चुके हैं.
जब लोगों के नेता राजनेता नहीं हुआ करते और राजनीतिज्ञ रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए फ़िल्म सितारों और क्रिकेटरों का दामन थामते हैं, ऐसे समय में अब्दुल कलाम एक ऐसे नेता हैं जो इंडिया से लेकर भारत तक हर जगह पसंद किए जाते हैं.
ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे जो आम जनता से लेकर वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षकों तक से एक सा आकलन पाएँ.
अंगरेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक और राजनीतिक मामलों के जानकार वीजी वर्गीज़ का मानना है कि अब्दुल कलाम के जाने से जनता का राष्ट्रपति चला गया.
वो कहते हैं, "राष्ट्रपति भवन से अब्दुल कलाम की विदाई से आम जनता को अफ़सोस होगा. उन्होंने आम लोगों से दोस्ती का रिश्ता कायम किया था."
अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति पद के कार्यकाल का आकलन करते हुए वर्गीज़ कहते हैं, "दो साल पहले मॉस्को में रहते हुए अब्दुल कलाम ने बिहार में राष्ट्रपति शासन के लिए अपनी अनुमति दे दी थी. ये ग़लत और ज़ल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला था जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने बदल भी दिया."
उन्होंने आगे कहा, "इसके अलावा उन्होंने बहुत बढ़िया काम किया. उन्होंने लाभ के पद वाला विधेयक भी सरकार को लौटा दिया था. यह बहुत हिम्मत का काम है."
सबकी पसंद
अब्दुल कलाम को भारत रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है.
उनके करियर में जो एक बात उभरकर आई वो यह है कि उन्होंने कभी टकराव का रास्ता नहीं अपनाया.
शायद इसीलिए उनका विरोध करने वाले मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीएम) के नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं कि व्यक्तिगत रूप से कलाम श्रद्धा के पात्र हैं.
वो कहते हैं, "अब्दुल कलाम तकनीकी क्षेत्र से आते हैं और भविष्य के भारत को लेकर उन्होंने अपनी योजनाएँ समाज के बीच रखी थीं. इन वजहों से कलाम ने समाज के अलग-अलग हिस्सों जैसे मीडिया, शहरी मध्य वर्ग, शिक्षित समाज और नौजवानों को अपना प्रशंसक बनाया."
अब्दुल कलाम ने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की दाँव-पेचों में उलझने की कोशिश नहीं की.
कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता और सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी का कहना है, "कलाम के रूप में हमें राष्ट्रपति पद पर एक ऐसा व्यक्ति मिला जो हमेशा भारत के विकास की चिंता करता रहा. राजनीति में कुछ लोग किसी को भी विवादास्पद बना देते हैं लेकिन कुल मिलाकर मैं यही कहूँगा कि उनका कार्यकाल साफ़-सुथरा ही रहा."
एपीजे अब्दुल कलाम बुधवार को फिर शिक्षक हो जाएँगे. अब ज़िम्मेदारी प्रतिभा पाटिल पर है कि वो अब्दुल कलाम की तरफ़ से स्थापित लोकप्रियता के मापदंडों पर खरा उतरती हैं या नए मापदंड स्थापित करना चाहती हैं.