मंगलवार, 24 जुलाई, 2007 को 20:49 GMT तक के समाचार
आलोक प्रकाश पुतुल
रायपुर से
छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरी की चाहत रखने वाले बेरोज़गार इन दिनों हैरान-परेशान हैं. वजह है सरकार की वे शर्तें जो नौकरी की विज्ञप्ति के साथ जारी हुई हैं.
सरकारी नौकरी के लिए पहली शर्त है कि आपके दो से अधिक बच्चे नहीं हों.
इसके अलावा इन दो बच्चों में अगर कोई छह साल से कम उम्र का हुआ तो भी सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी और विवाह के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु से पहले विवाह करने वाले को तो नौकरी मिलने का सवाल ही नहीं है.
छत्तीसगढ़ सरकार की इन शर्तों से राज्य के बेरोज़गार हैरान हैं.
दरअसल, छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले दिनों उप-अभियंता के 129 पदों के लिए स्थानीय अख़बारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन जारी किया, जिसमें इस तरह की शर्तों का उल्लेख है.
विज्ञापन में कहा गया है कि कोई भी उम्मीदवार जिसकी दो से अधिक जीवित संतान हैं और इनमें से एक का जन्म 26 जनवरी, 2001 को या उसके पश्चात हुआ हो, नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा.
राज्य सरकार की इन शर्तों को लेकर राज्य भर में बहस शुरु हो गई है.
महिला संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है और मानवाधिकार संगठन उच्च न्यायालय में जाने की तैयारी कर रहे हैं.
1990 के दशक में पहली बार पंचायत क़ानून में दो संतानों का प्रावधान रखा गया था, जिसे कई राज्यों में लागू किया गया था.
इसके तहत पंचायत के विभिन्न पदों के लिए वही लोग पात्र थे, जिनकी दो से अधिक संतान नहीं हो.
इस क़ानून के बाद सैकड़ों ऐसे मामले सामने आए, जिसमें तीसरी संतान होने के बाद सरपंच या पंच को उसके पद से हटा दिया गया.
विवाद
इसके बाद इस मुद्दे पर ढ़ेरों विवाद हुए और इस क़ानून को ख़ासतौर पर महिलाओं का विरोधी बताते हुए तर्क दिया गया कि भारतीय समाज में बच्चों के जन्म को लेकर पुरुष निर्णायक भूमिका में होता है.
कई मामले ऐसे आए, जब किसी महिला सरपंच की दो बेटियाँ थीं और उसका पति एक बेटा चाहता था.
ऐसी हालत में महिला सरपंच के सामने पद या घर छोड़ने में से कोई एक विकल्प चुनना अनिवार्य था.
लेकिन दो से अधिक संतान होने पर नौकरी के लिए अपात्र होने की शर्त देश में संभवतः पहली बार छत्तीसगढ़ में ही रखी गई है.
राज्य सरकार के अधिकारी भी इस शर्त को लेकर असमंजस में हैं.
हालत ये है कि राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में भर्ती के लिए जारी किए गए इस विज्ञापन को लेकर राज्य के ज़िम्मेवार अधिकारी अपना पल्ला झाड़ रहे हैं.
सभी अनजान
राज्य में होने वाली नियुक्तियों के सारे मामले जिस सामान्य प्रशासन विभाग के ज़िम्मे होते हैं, उसके सचिव जवाहर श्रीवास्तव का कहना है कि हर विभाग के भर्ती नियम अलग-अलग होते हैं. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में अगर ऐसा कोई नियम है तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है.
दूसरी ओर, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के संचालक पीपी सोती कहते हैं, “मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता. जिन लोगों ने भर्ती का विज्ञापन निकाला है, इस बारे में सारे नियम-क़ायदे की जानकारी वही दे सकते हैं. ”
इस विज्ञापन को जारी करने और परीक्षा लेने वाले छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल के संयुक्त नियंत्रक डॉ अरुण सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार का कोई नियम ऐसा है, जिसके तहत ये विज्ञापन जारी किए गए हैं.
हालाँकि डॉ अरुण सिंह इस नियम के बारे में और कुछ नहीं जानते.
उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सौरभ डांगी बताते है कि किसी भी नए नियम को पुरानी तारीख़ों से नहीं लागू किया जा सकता.
सौरभ पूछते हैं, “बेरोजगारों के सामने पहली बार 2007 में छत्तीसगढ़ सरकार इस नियम को ला रही है. ऐसी स्थिति में वे आवेदक क्या करें जिनको 2001 से 2007 की अवधि में तीसरी संतान पैदा हुई है? ”
नेशनल फे़डरेशन ऑफ इंडियन वुमेन ने छत्तीसगढ़ सरकार की इस नीति की निंदा करते हुए कहा है कि इस तरह की नीतियां वस्तुतः महिला विरोधी हैं.
संगठन ने छत्तीसगढ़ सरकार की इस नीति का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध करने का निर्णय लिया है.
महिला संगठन वसुधा की सत्यभामा अवस्थी कहती हैं, “सरकार ने जिस तरह से दो बच्चों की शर्त नौकरी के लिए रखी है, उसके ख़िलाफ़ हम हरसंभव लड़ाई लड़ेंगे.”
मानवाधिकार संगठन एफएफडीए के सुभाष महापात्रा पूरे मामले को उच्च न्यायालय तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं.
सुभाष कहते हैं, “इस तरह की शर्त अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकार का उल्लंघन है. किसी को उसकी संतान की संख्या के आधार पर नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता.”