सोमवार, 23 जुलाई, 2007 को 07:33 GMT तक के समाचार
शालिनी जोशी
देहरादून से
उत्तराखंड के गोमुख केंद्र में सोमवार को आए भूकंप ने नीति-निर्माताओं और भूवैज्ञानिकों की पेशानी पर बल डाल दिया है.
हाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने आगाह किया है कि उत्तराखंड शत-प्रतिशत भूकंप के ख़तरे की जद में है और बढ़ते अनियोजित विकास से हलकी तीव्रता का भूकंप भी यहां कहर बरपा सकता है.
देहरादून स्थित भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के निदेशक पीसी नोवानी का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में आठ क्षमता का भूकंप 90 से सौ किमी तक की दूरी और 12 से 15 किमी तक की गहराई में उत्पन्न होता है.
इस लिहाज से उत्तराखंड का कोई भी इलाक़ा भूकंप के ख़तरे से बाहर नहीं है और यहां 7-8 तीव्रता के भूकंप की संभावना बनी रहती है.
तीन साल के अध्ययन के बाद जारी की गई जीएसआई की रिपोर्ट के अनुसार भूकंप के लिहाज से उत्तराखंड के चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी और पिथौरागढ़ जिले जोन-5 में हैं जो कि अति संवेदनशील हैं.
और देहरादून,चंपावत, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जोन-4 में हैं जो कि संवेदनशील माना जाता है.
भूकंप का ख़तरा
गौरतलब है कि 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप में सैकड़ों लोग मारे गये थे और करोड़ों की संपत्ति का नुक़सान हुआ था.
इस भूकंप की दहशत आज भी यहां के लोगों के चेहरे पर देखी जा सकती है. इसीलिए भूकंप का हलका झटका भी यहां अफ़रातफ़री मचा देता है और फिर कई-कई दिनों तक लोग घरों के बाहर सोना शुरू कर देते हैं.
भूवैज्ञानिकों के अनुसार बार-बार भूकंप आने का कारण हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में जमा अवसाद है जोकि भूकंपीय कंपन को और बढ़ाता है.
इसके बावजूद यहाँ सरकार और प्रशासन में भूकंपरोधी निर्माण को लेकर कोई सोच नज़र नहीं आती.
जीएसआई के निदेशक पीसी नोवानी का कहना है,'' हमारी बार-बार चेतावनी के बावजूद ध्यान नहीं दिया जा रहा है और आज राज्य के आधे से ज्यादा मकान और इमारतें भूकंप के लिहाज से ख़तरनाक हैं और भूकंप से यहां बड़े पैमाने पर तबाही हो सकती है.''
उनका कहना है कि भूकंप यहां की सच्चाई है और उसे रोका नहीं जा सकता.
नोवानी कहते हैं कि जिस तरह जापान के लोगों ने भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल कर अपने-आपको सुरक्षित कर लिया है, यहां भी वैसी ही सजगता ज़रूरी है.
वो कहते हैं कि अनियोजित विकास और बहुमंजिली इमारतों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए और इसी तरह से पहाड़ी इलाकों में पत्थरों के मकान का भी विकल्प ढूंढा जाना चाहिए.
साथ ही पुरानी जर्जर इमारतों को गिरा दिया जाना चाहिए.