सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण पर रोक हटा लेने संबंधी केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई 31 जुलाई को करने का फ़ैसला किया है.
मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आरक्षण के मुद्दे को संविधान पीठ को सौंपने के बारे में भी अगले सप्ताह सुनवाई करने का निर्णय लिया है.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 फ़ीसदी आरक्षण पर रोक को हटा लेने का अनुरोध किया है.
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 29 मार्च को रोक लगा दी थी.
सरकार की दलील
सरकार का कहना है कि पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटें बढ़ाने के बावजूद सामान्य श्रेणी की सीटों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है.
केंद्र सरकार का कहना है कि क़ानून बनने के बाद कई केंद्रीय संस्थानों ने ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों पर दाखिला देने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.
लेकिन इस पर स्टे के बाद यह प्रक्रिया रुक गई. अगर यह रोक जारी रही तो ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों पर चुने गए बड़ी संख्या में उम्मीदवार दाखिला नहीं ले पाएंगे और उनका एक साल बर्बाद हो जाएगा.
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली विश्वविद्यालय और पुणे स्थित सिंबायोसिस यूनिवर्सिटी से कहा था कि वे अगले आदेश तक ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण न दें.
एक याचिका में कहा गया था कि अदालत के इस क़ानून पर रोक लगाने के बावजूद दोनों संस्थान 27 फ़ीसदी आरक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं.
जस्टिस बीएन अग्रवाल और जस्टिस पीपी नाओलेकर की खंडपीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय और सिंबायोसिस को नोटिस जारी किया है.