शनिवार, 14 जुलाई, 2007 को 13:43 GMT तक के समाचार
अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत में अनेक जगहों पर बुज़ुर्गों के लिए 'ओल्ड एज होम' हैं लेकिन भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की कश्मीर घाटी में ऐसा पहली बार हो रहा है कि एक 'ओल्ड एज होम' या वृद्धाश्रम खोला जा रहा है.
दरअसल, कश्मीर घाटी में सभी धर्मों के मतावलंबी मानते आए हैं कि माता-पिता भगवान का रुप होते हैं. परंपराओं से जुड़े इस समाज में आज तक कभी किसी वृद्धाश्रम की ज़रूरत नहीं पड़ी.
घाटी में आज भी संयुक्त परिवार देखे जा सकते हैं जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के साथ ही रहते हैं. लेकिन अब यह सब बदल रहा है.
कश्मीर घाटी में ऐसे बुज़ु्र्गों की संख्याँ लगातार बढ़ रही है जिनके बच्चे शादी, नौकरी, कारोबार या अन्य कारणों से अपने माता-पिता से अलग हो गए हैं और अब इन बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम की ज़रूरत महसूस की जा रही है.
हालाँकि ऐसे बुज़ुर्ग भी हैं जो संयुक्त परिवार में ही रह रहें हैं. लेकिन उनके बच्चों के पास अपने माँ-बाप के लिए समय नहीं है. इन बुज़ुर्गों को तन्हाई का अहसास खाए जा रहा है.
'बच्चों के पास समय नहीं'
श्रीनगर के 78-वर्षीय एक वरिष्ठ व्यापारी ग़ुलाम मोहम्मद डार कहते हैं, "बच्चे व्यापार करते हैं और रात में दस-ग्यारह बजे तक घर आते हैं. उनके लिए ख़ुद अपने बच्चों की देखभाल करना मुश्किल है. उनके पास समय ही नहीं बचता. ऐसे में वो हमें समय कहाँ से देंगें?"
इस दर्द से आहत ग़ुलाम मोहम्मद डार ने पिछले दिनों अपनी जैसी स्थिति में अन्य लोगों के साथ मिलकर 'जम्मू-कश्मीर सीनियर सिटीज़न्स काउंसिल' नामक बुज़ुर्गों का एक संगठन बनाया है.
सीनियर सिटीज़न्स काउंसिल जल्द ही श्रीनगर में वृद्धाश्रम शुरु करेगा.
शुरुआत में बुज़ुर्ग वहाँ दिन में कुछ घंटे गुज़ार सकेंगे. लेकिन ग़ुलाम मोहम्मद डार का कहना है कि बाद में बुज़ुर्गों के लिए स्थाई रुप से रहने की भी व्यवस्था की जाएगी.
अपने-अपने कारण
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एसएस कादिरी कहते हैं, "मेरी तबीयत वैसे तो ठीक-ठाक रहती है पर मुझे ऐसी देखभाल नहीं मिल पाती जिसकी इस उम्र में किसी बुज़ुर्ग मिलनी चाहिए. समय पर भोजन, अपनी पसंद की चीज़े इत्यादि. लेकिन अब ये मुमकिन नहीं हैं. इसलिए मैं वृद्धाश्रम में रहना पंसद करूंगा."
प्रोफ़ेसर एसएन गंजू सेवानिवृत्त होने के बाद भी पढ़ने-लिखने में व्यस्त रहते हैं. लेकिन वे भी ख़ुद को बेहद अकेला महसूस करते हैं.
प्रोफ़ेसर गंजू कहते हैं, "मेरा बेटा मुझसे महीने में सिर्फ़ एक बार टेलीफ़ोन पर बात करता है. नई पीढ़ी पैसे के लिए पागल हो गई है. पारिवारिक मूल्य ख़त्म ही हो गए हैं. इसलिए मुझे लगता है कि बुज़ुर्गों के लिए कम से कम एक ऐसी जगह तो होना ही चाहिए जहाँ वो खुलकर ठहाके लगा सकें और बात कर सकें. इससे उन्हें और कुछ नहीं तो मानसिक रूप से संतुष्टि तो मिलेगी ही.”
लेकिन बुज़ुर्गों को सिर्फ़ तन्हाई का ही दर्द नहीं है. ऐसे भी कई बुज़ुर्ग हैं जो अपने बेटों के साथ ही रह रहें हैं. लेकिन अब काम-काज छोड़ देने के बाद एक-एक पैसे को मोहताज हैं.