रविवार, 08 जुलाई, 2007 को 13:02 GMT तक के समाचार
रेणु अगाल
बीबसी संवाददाता, दिल्ली
इस वर्ष एक जुलाई को जम्मू राज्य में भारतीय सेना की कैप्टन मेघा राज़दान की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. प्रारंभिक रिपोर्टों में कहा गया कि उन्होंने आत्महत्या की है पर अब उनके पिता अरुण कुमार राज़दान इसे हत्या बता रहें हैं और सेना अधिकारियों पर शक़ ज़ाहिर कर रहे हैं.
इससे पहले, पिछले साल सेना का एक अन्य महिला अधिकारी सुष्मिता सुष्मिता चक्रवर्ती ने आत्महत्या कर ली थी और तब भी उनके परिवार ने उनकी आत्महत्या पर सवाल उठाए थे.
इस बारे में सेना के प्रवक्ता कर्नल सखूजा का मानना है, “दुख झेल रहे परिवार ऐसे वक्तव्य देते हैं. ऐसे हर मामले पर सेना और पुलिस की जाँच होती है.”
सेना का दावा
भारतीय सेना में 500 से अधिक महिला डॉक्टर और 3000 से ज़्यादा नर्सें भी काम करती हैं और जहाँ तक इनके उत्पीड़न की शिकायतों का सवाल है, सेना के अधिकारियों का कहना है कि इनसे निपटने की सेना में पूरी व्यवस्था है.
इस बारे में कर्नल सखूजा कहते है, “ भारतीय सेना से बेहतर चैनल सिस्टम कहीं भी नहीं है. हर यूनिट में एक अनुभवी, समझदार और संवेदनशील कमांडिग अफ़सर होता है. आमतौर पर अधिकतर समस्याओं का समाधान वहीं पर हो जाता है. अगर इसके बावज़ूद किसी को कोई समस्या होती है तो वह कभी भी किसी भी सीनियर अफ़सर से शिकायत कर सकता है. सारे अफ़सर इनके समाधान के लिए तत्पर रहते हैं.”
कैप्टन पर्ल सलोमी दस साल सेना में काम करने के बाद अब निजी क्षेत्र में काम कर रहीं हैं.
वे सेना में गैर-पारंपरिक ड्यूटी के लिए चुने गए दूसरे बैच में शामिल थी और आर्मी ऑर्डिनेंस कोर में काम कर चुकी हैं.
सुख-सुविधा का ख़्याल
कैप्टन पर्ल का सेना में दूसरा बैच था. उनका कहना है कि तब भी सेना ने महिला अफ़सरों की सुख-सुविधा का पूरा ख़्याल रखा था.
वो कहती हैं, “जब मेरी दिल्ली में पहली पोस्टिंग हुई तो हमारे कमांडिंग ऑफ़ीसर ने बताया कि हर यूनिट में दो महिला अधिकारी होंगी. इससे हमें नए माहौल और नई जगह में बड़ी सुविधा हुई.”
सेना के सूत्रों का कहना है कि अब मर्दों की तरह औरतों को भी 49 हफ़्तों का प्रशिक्षण देकर उन्हें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रुप से तैयार किया जाता है.
उन्हें उनकी पंसद का काम देने की कोशिश की जाती है, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 11 लाख़ में चार-पाँच हज़ार महिलाएँ कोई बड़ी संख्या नहीं है.
किसी भी सेना में एक औसत जवान जिस सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आता है, उसके लिए महिला अधिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में तकलीफ़ हो सकती है और यही समस्या महिला अफ़सरों के सामने भी आती है.
ऐसे में छेड़छाड़, उत्पीड़न जैसे आरोप भी लगते रहते हैं. वर्ष 2002 से 2006 के बीच पाँच ऐसे मामले सामने आए हैं. इनमें से कुछ का फ़ैसला हो चुका है और कुछ की जाँच जारी है.
सीमित ज़िम्मेदारी
इस सबके बीच महिलाएँ भी यह सवाल पूछ रहीं हैं कि उनकी सेना में नौकरी 14 वर्ष तक ही सीमित क्यों रखी गई है?
इसके साथ ही माँग यह भी हो रही है कि सीमा पर दुश्मन से दो-दो हाथ करने का हक़ भी महिलाओं को दिया जाना चाहिए.
लेकिन पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक का मानना हैं कि दुनिया भर में ऐसा कहीं नहीं होता.
वे कहते हैं, “दुनिया भर में लड़कियों को कहीं भी इस तरह से आगे नहीं किया जाता. हमें अपने देश की सामाजिक स्थिति भी देखनी होती है. हम अमरीका और इसराइल की तरह नहीं हो सकते जहाँ एक लड़की चार-पाँच लड़कों के साथ बंकर में रहती है या टैंक में काम रहती है."
वे आगे कहते हैं, "हम लड़कियों को अग्रिम मोर्चे पर प्राइवेसी नहीं दे पाएँगे. वहीं यह डर भी बना रहता है कि लड़ाई के दौरान लड़की यदि पकड़ी गई तो दुश्मन उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे. इन सबके मद्देनज़र अभी लड़कियों को लड़ाई के मैदान में न भेजने का फ़ैसला पूरी तरह से सही हैं.”
एक ओर सेना ज़ोर देकर कहती है कि महिलाएँ उसकी शक्ति हैं और वे सेना का अहम हिस्सा हैं, पर जब भी मेघा राज़दान जैसे मामले सामने आते है तब सेना के इन दावों पर सवालिया निशान लग जाता है.