शुक्रवार, 06 जुलाई, 2007 को 06:58 GMT तक के समाचार
अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों की कथित रूप से बिगड़ती स्थिति के विरोध में शुक्रवार को एक बंद का आह्वान किया गया है.
बंद का आह्वान राज्य के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की ओर से किया गया है.
पूरी घाटी में शुक्रवार सुबह से ही इस बंद का असर देखने को मिल रहा है और आम जनजीवन इससे प्रभावित हुआ है.
ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों राज्य के कुपवाड़ा और बांदीपुरा ज़िलों में कथित मुठभेड़ में आम नागरिकों के मारे जाने और एक नाबालिग लड़की से बलात्कार की ख़बरें आई थीं.
इसे लेकर दोनों ज़िलों में ख़ासा विरोध-प्रदर्शन दर्ज हुआ था. शुक्रवार का यह बंद इसी कड़ी में एक और विरोध है.
घाटी के अधिकतर इलाकों में व्यापारिक प्रतिष्ठान, बैंक और दुकानें इस आम हड़ताल के चलते बंद हैं.
हड़ताल के कारण यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई है. सड़कों पर केवल निजी वाहन ही दिखाई दे रहे हैं. यहाँ तक की सरकारी कार्यालयों में भी हड़ताल के चलते कर्मचारियों की संख्या कम ही है.
इससे पहले बंद के मद्देनज़र गुरुवार को ही पुलिस ने गिलानी धड़े के क़रीब 20 ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रैंस नेताओं को हिरासत में ले लिया था.
मानवाधिकारों पर चिंता
ग़ौरतलब है कि इसी वर्ष मई में यूरोपीय संसद ने कश्मीर विवाद पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की थी जिसमें पूरे कश्मीर क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर चिंता जताई गई थी.
यूरोपीय संसद में इस रिपोर्ट कई साल से चर्चा और बहस हो रही थी जिसमें लोकतंत्र और मानवाधिकारों की स्थिति में धीमी प्रगति के बारे में पाकिस्तान की आलोचना भी की गई.
रिपोर्ट में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बारे में कहा गया था कि वहाँ लोगों को मूलभूत अधिकार ही उपलब्ध नहीं हैं, ख़ासतौर से महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों को को समुचित अधिकार हासिल नहीं हैं. रिपोर्ट में लोगों के साथ प्रताड़ना, दुर्व्यवहार, भेदभाव और भ्रष्टाचार पर भी चिंता जताई गई.
अपनी रिपोर्ट में यूरोपियन युनियन ने भारत प्रशासित कश्मीर के संदर्भ में भारत सरकार का आहवान करते हुए कहा था कि वह सुरक्षा बलों की हिरासत में या फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में लोगों की मौत, लोगों के लापता होने, प्रताड़ना और लोगों को ज़बरदस्ती जेलों में बंद करने के मामलों पर रोक लगाए.
भारत सरकार से यह भी कहा गया कि सुरक्षा बलों के हाथों होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर मामलों की जाँच कराने के लिए एक स्वतंत्र आयोग का गठन करे और सुरक्षा बलों को दिए गए विशेष अधिकारों को कम करे.