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गुरुवार, 05 जुलाई, 2007 को 12:44 GMT तक के समाचार

'बच्चे नादान हैं, उन्हें बचाओ'

"छात्रों को सुरक्षा मुहैया करानी ज़रूरी है. वे अभी नादान हैं". यह कहना है क़ाज़ी ख़लीक़ का जिनका 18 साल का भाई इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में इस समय भी मौजूद है.

ख़लीक़ का भाई मस्जिद से जुड़े मदरसे जामिया फ़रीदिया का छात्र है.

क़ाज़ी ख़लीक़ की ही तरह अन्य छात्रों के सैकड़ों रिश्तेदार मस्जिद के बाहर के सुरक्षा घेरे के उस पार परेशान और बेचैन खड़े हैं.

उनका कहना है कि सरकार ने जल्दबाज़ी करके स्थिति को संभलने का मौक़ा नहीं दिया.

ख़लीक़ कहते हैं, "वे ज़िम्मेदार लोग हैं. उन्हें समझना चाहिए कि वे बच्चों से मुक़ाबला कर रहे हैं".

मस्जिद के बाहर तारों की बाड़ के दूसरी ओर मौजूद कई माता-पिता अपने बच्चों की एक झलक पाने को आतुर हैं.

लाल मस्जिद और उसके आसपास के इलाक़े में अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू लगाने के बाद सरकार ने लाउडस्पीकर की मदद से छात्रों से कहा है कि वे आत्मसमर्पण कर दें.

कई आश्वासन

जो लोग निहत्थे बाहर आएँगे उन्हें क्षमादान के अलावा पाँच हज़ार रुपये, सुरक्षित यात्रा और मुफ़्त पढ़ाई की गारंटी दी जा रही है.

लेकिन माता-पिता वर्तमान स्थिति बिगड़ने के लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के एक सेवानिवृत्त सैनिक मोहम्मद जावेद कहते हैं, मेरी दो बेटियाँ अंदर हैं और मुझे उनकी चिंता है. वे 14 और 10 वर्ष की हैं और कहती हैं कि वे इस्लाम के लिए जान दे सकती हैं.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार ने छात्रों का जीवन ख़तरे में डाल दिया है.

जावेद कहते हैं, "यह सरकार की ग़लती है. उन्हें पीछे हट जाना चाहिए. वे आम आदमी के बारे में तो सोचते ही नहीं हैं".

बुधवार को अभिभावकों को आशा की एक किरण दिखाई दी थी जब उन्हें मस्जिद के क़रीब जा कर अपने बच्चों को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने की अनुमति मिल गई थी.

बहुत से माता-पिता अब भी ऐसा ही कर रहे हैं और उसकी बदौलत सैकड़ों बच्चे बाहर निकल आए हैं.

बीबीसी ने बाहर निकल चुके कुछ लोगों से बात की. उनमें से एक इमरान शाहीन का कहना था कि वह नमाज़ पढ़ने मस्जिद गए थे लेकिन लड़ाई शुरू हो गई और वह वहाँ फंस गए.

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान

उनका कहना है कि अगले दिन कर्फ़्यू लगने पर ही वह बाहर निकल पाए.

शाहीन के मुताबिक अंदर माहौल बेहद तनावपूर्ण है लेकिन अधिकतर छात्राएँ बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं क्योंकि मस्जिद के प्रबंधकों ने उन्हें अंदर ही रहने का आदेश दिया था.

उनसे कहा गया था कि यदि वे मस्जिद की पवित्रता की रक्षा नहीं कर सकतीं तो उनका जीवन बेकार है.

इमरान शाहीन का कहना है कि अंदर जो बच्चे हैं उनमें से कुछ तो इनते छोटे हैं कि उनकी उम्र 10 साल से अधिक नहीं है.