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शनिवार, 23 जून, 2007 को 13:03 GMT तक के समाचार

हामिद करज़ई ने तेवर कड़े किए

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने पश्चिमी सहयोगी देशों से कहा है कि अब से आगे उन्हें देश में उस तरह से काम करना होगा जैसाकि अफ़ग़ान सरकार उनसे करने के लिए कहेगी.

हामिद करज़ई का यह सख़्त बयान ऐसे समय में आया है जब बीते सप्ताह नैटो सेनाओं के हमलों में लगभग 90 आम अफ़ग़ान नागरिक मारे गए हैं.

हामिद करज़ई ने ग़ुस्से में कहा कि पश्चिमी देशों ने कई वर्षों से अफ़ग़ान सरकार की इन सिफ़ारिशों को नज़रअंदाज़ किया है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई में किस तरह से आम लोगों को निशाना बनने से रोका जा सकता है.

काबुल में बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि इस मुद्दे पर हामिद करज़ई की यह काफ़ी सख़्त भाषा मानी जा रही है. यह बात कहते हुए हामिद करज़ई का चेहरा मुरझाया हुआ था, जैसाकि आमतौर पर नहीं होता क्योंकि हामिद करज़ई के चेहरे पर आमतौर पर मुस्कुराहट नज़र आती है.

अफ़ग़ानिस्तान में इस समय दो अंतरराष्ट्रीय सैन्य मिशन जारी हैं. एक है अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और सहायता सेना जिसका नेतृत्व नैटो कर रहा है. इसमें 37 देशों के लगभग 37 हज़ार सैनिक हैं जिनमें अमरीकी सैनिक भी हैं.

इस सेना का मक़सद अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा बहाली करने और विकास के साथ-साथ बेहतर सरकार और प्रशासन की स्थापना में मदद करना है.

दूसरा है अमरीकी नेतृत्व वाला विदेशी सैन्य गठबंधन जिसका नाम है ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम यानी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का अभियान. यह मुख्य रूप से आतंकवाद निरोधक मिशन है जिसमें विशिष्ठ सैनिक भाग ले रहे हैं.

हाल के समय में इन दोनों ही सेनाओं की चरमपंथियों से भीषण लड़ाइयाँ हुई हैं.

उदासी और ग़ुस्सा

काबुल में हामिद करज़ई ने पत्रकारों से कहा कि हेलमंद प्रांत में नैटो सेनाओं ने गत गुरूवार को हवाई हमले में जो बमबारी की उससे साफ़ नज़र आता है कि ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग किया गया.

राष्ट्रपति ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सेनाएँ अफ़ग़ान सेनाओं के साथ तालमेल बिठाने की कोई कोशिश नहीं कर रही हैं और भविष्य में कोई भी सैन्य अभियान उनकी सरकार के साथ तालमेल बिठाकर ही चलाया जाएगा और उसके लिए पहले से ही लिखित रूप में तैयार योजनाओं का पालन किया जाएगा.

राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा कि पिछले सप्ताह उरुज़गान प्रांत में विदेशी सेनाओं की बमबारी में भी 62 आम अफ़ग़ान मारे गए थे.

उन्होंने कहा कि अफ़ग़ान लोगों का जीवन सस्ता नहीं है और न ही इसे सस्ता समझा जाना चाहिए, हर जीवन क़ीमती होता है, "हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सहयोग करना चाहते हैं. हम विदेशी सेनाओं के शुक्रगुज़ार हैं लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान में लोगों की ज़िंदगी की कोई क़ीमत नहीं है."

अफ़ग़ानिस्तान के सहयोगी पश्चिमी देशों से अफ़ग़ान सुरक्षा बलों को मज़बूत बनाने में मदद देने की बात करते हुए हामिद करज़ई ने कहा कि उन्हें अब किसी भी सैन्य कार्रवाई के बारे में अफ़ग़ान सरकार की सिफ़ारिशों को स्वीकार करना होगा. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कई वर्षों से ऐसा नहीं हुआ है.

हामिद करज़ई ने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि वे पश्चिमी मानक और पैमाने अफ़ग़ानिस्तान में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं होने दिया जाएगा.

उन्होंने सख़्त भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा, "अब से आगे अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिमी देशों की सेनाओं को उसी तरह से काम करना होगा जो हम करने के लिए कहेंगे."

बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं कि वर्ष 2007 में विदेशी सेनाओं के हमलों में कहीं ज़्यादा आम लोग मारे गए हैं जितने कि चरमपंथियों के हाथों भी नहीं मारे गए.