सोमवार, 18 जून, 2007 को 13:15 GMT तक के समाचार
अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, काबुल से
आपने टूटते-बिखरते काबुल की तस्वीरें तो देखी होंगी लेकिन अब काबुल हिंसा के इतिहास में अपने लिए नई बुनियादें रखने की कोशिश करता हुआ शहर है.
काबुल सैर-सपाटे का शहर तो नहीं है, हालाँकि इसमें पर्यटन का केंद्र बनने की काफ़ी संभावनाएँ हैं.
काबुल अफ़ग़ानिस्तान के सत्ता संघर्ष का केंद्र है इसलिए यहाँ बनती हर इमारत और इसमें रहने वाले लोग भी इस एहसास के साथ ही जीते हैं.
जब हम किसी शहर में पहुँचते हैं, तो सबसे पहले दिन ऐसे बाहर निकलते हैं जैसे शहर की नब्ज़ टटोलना चाहते हों.
आधुनिकता
लेकिन काबुल की पेचीदगियों में इसकी गुंजाइश कम है. यह ऐसा शहर नहीं है जैसा मैं सोच कर आया था कि उजड़ा और बेतरतीब होगा. बिल्कुल नहीं.
शहर की ज्यादातर चौड़ी सड़कों पर गाड़ियों की भरमार है. सारी गाड़ियां विदेशी हैं क्योंकि यहाँ गाड़ियां नहीं बनती.
ट्रैफ़िक भी सलीके से ही चलता है. शेरे-नौ और वली-अक़बर ख़ान जैसे पॉश इलाकों में हर बड़ी कोठी के बाहर हथियारों से लैस कई गार्ड खड़े दिखते हैं.
इन इलाकों में हरे शीशे की बड़ी-बड़ी खिडकियों वाले शॉपिंग मॉल बन रहे हैं. पहले वाला काबुल कहीं नहीं है.
जो पुराना काबुल है वहाँ ज़्यादातर ग़रीब लोग रहते हैं जिन्हें हिफ़ाज़त की ज़रूरत नहीं. तालेबान और मुजाहिदीन के बीच लड़ाई में ध्वस्त हुए कई मकानों के खंडहर अभी भी नए मकानों के साथ ही खड़े हैं.
पहली शाम मैं इस शहर में इसके इतिहास के निशान ढूँढने की कोशिश कर रहा था.
इतिहास के निशान
जो शहर बमों की बारिश में लगभग गिर गया हो और अपने आपको एक बेढब आधुनिकता में बनता देख रहा हो वहाँ कितना इतिहास मिल सकता है भला.
लेकिन एक जगह है. बा बाबर. यानी बाबर पार्क. यहाँ मुग़ल बादशाह बाबर की कब्र है.
आस-पास बगीचे में पुरसुकून माहौल है. बच्चे तालाब में तैर रहे हैं. तैर क्या रहे हैं, खेल रहे हैं.
भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर को भारत में ज़्यादा सहानुभूति से नहीं देखा जाता.
ज़्यादातर यही किस्से सुनने में मिलते है कि एक आक्रमणकारी ने सैकड़ो हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था, ज़्यादतियां की थीं.
लेकिन यहाँ काबुल में बाबर सबसे बड़े नायकों में से हैं.
दोस्ती
काबुल के लोग भारतीय लोगों को बहुत पसंद करते हैं.
कहते हैं सदियों से दोस्ती रही है हमारे मुल्कों में. नाता रहा है. भारत हमारे लिए बहुत कुछ करता है.
यह जानकार कि मैं भारतीय हूँ कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वो पाकिस्तान को पसंद नहीं करते.
कहते हैं पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान का दोस्त नहीं है. और फिर हंस कर कहते हैं वो तो भारत का भी दोस्त नहीं.
लेकिन यह काबुल और अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी इलाकों की बात है. कंधार जैसे दक्षिणी शहरों में लोगों की राय अलग है.
वो पाकिस्तानियों को पसंद करते हैं और विडंबना की बात तो यह है कि जहाँ भारत अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभा रहा है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान में मसाले और चावल से लेकर पानी की बोतल तक पाकिस्तान से आती है.
फ़र्क
फ़र्क है दक्षिण और उत्तर में. काबुल में सबसे बड़ा स्तंभ उत्तरी अलायंस के पूर्व कमांडर और सोवियत सेना के ख़िलाफ़ लड़ने वाले मुजाहिद अहमद शाह मसूद को समर्पित है.
कई जगह अहमद शाह मसूद की तस्वीरें और पोस्टर लगे हैं.
ग्यारह सितंबर के हमलों से ठीक दो दिन पहले अहमद शाह मसूद की एक आत्मघाती बम हमले में हत्या कर दी गई थी.
काबुल में घूमते हैं तो हर तरफ़ एक अहसास मिलता है कि बम विस्फोटों का सिलसिला फिर से शुरु हो चुका है.
रविवार को ही काबुल में पिछले सात वर्षों का सबसे बड़ा बम विस्फोट हुआ जिसमें कम से कम पैंतीस लोग मारे गए.
जो हिंसा दक्षिणी शहरों तक सीमित थी, अब काबुल को झुलसा रही है.
लोग झुलस रहे हैं मगर दुआ भी कर रहे हैं कि अब फिर नहीं, अब और नहीं.
काबुल के तेज़-तेज़ चलने वाले लोग जैसे दिल ही दिल में आतंक के मंडराते साये से दूर, बहुत दूर निकल जाना चाहते हैं.