सोमवार, 18 जून, 2007 को 08:20 GMT तक के समाचार
अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिमी देशों के भारी-भरकम सैनिक जमावड़े के बावजूद अब भी यही यक्ष प्रश्न है कि क्या तालेबान का चक्रव्यूह टूट पाएगा.
बीबीसी अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर सप्ताह भर विभिन्न रिपोर्टें प्रसारित और प्रकाशित करेगा.
इसके तहत बीबीसी के विश्व मामलों के संपादक जॉन सिम्पसन इस बात का विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या अफ़ग़ान सरकार और पश्चिम की सेनाएँ तालेबान के ख़िलाफ़ जारी जंग जीत सकती हैं?
दरअसल, तालेबान नए आत्मविश्वास और नई रणनीति से अफ़ग़ान सरकार और इसका साथ दे रही नैटो सेनाओं के ख़िलाफ़ अभियान चला रहा है और इस साल की शुरुआत से ही उसे अपने अभियानों में सफलता भी मिल रही है.
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी हिस्से जलालाबाद के आसपास जब-तब आत्मघाती हमले होते रहते हैं और यहाँ से काबुल जाने वाली सड़क को 'बग़दाद सड़क' के नाम से जाना जाने लगा है.
मैं 1989 के बाद से ही जलालाबाद आता रहा हूँ, लेकिन जहाँ तक मुझे याद आता है पहली बार वहाँ घूमने के लिए हमें पुलिस सुरक्षा की ज़रूरत पड़ी.
शहर के पास के एक गाँव में जब हम रुके तो भीषण गर्मी के बावजूद सुरक्षाबलों ने हमें वाहन से नीचे न उतरने की हिदायत दी.
पुलिस का कहना था, "यहाँ चप्पे-चप्पे पर तालेबान के भेदिये मौजूद हैं."
पुलिस और सुरक्षा बल इस इलाक़े में तालेबान और अल-क़ायदा लड़ाकों का मुख्य निशाना हैं.
शहर में पुलिस मुख्यालय के बाहर एक वरिष्ठ पुलिसकर्मी हमारी तरफ दौड़ता हुआ आया और मुख्यालय का फिल्मांकन रोकने को कहा.
उनका कहना था कि ये हरकत आत्मघाती हमलावरों का ध्यान हमारी ओर आकर्षित कर सकती है.
इस इमारत को कई बार निशाना बनाया जा चुका है और एक जिंदा रॉकेट तो अब भी इमारत के सामने के पेड़ पर अटका हुआ है.
दहशत की रणनीति
पिछले साल के आख़िर तक जलालाबाद अपेक्षाकृत शांत था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में ही यह जंग के मैदान में तब्दील हो चुका है.
'बग़दाद सड़क' के आसपास रहनेवाले लोग बताते हैं कि कुछ हफ़्ते पहले किस तरह अमरीकी सैनिकों ने एक आत्मघाती हमले के बाद वहाँ से गुजर रहे लोगों पर गोलियाँ बरसाई.
सैनिकों का दावा था कि उन पर सड़क के दूसरी ओर से छोटे हथियारों से गोलियाँ चलाईं गईं.
हालाँकि बाद में स्थानीय प्रशासन ने माफ़ी माँगी और मृतकों के आश्रितों को मुआवजा दिया.
इस घटना और देश के दूसरे हिस्सों में हो चुके ऐसी ही घटनाओं का ये असर हुआ है कि अब नैटो और अमरीकी सेनाओं को लोग अब आमतौर पर अविश्वास और नफ़रत की नज़र से देखते हैं.
तालेबान विद्रोहियों ने ऐसी रणनीति तैयार की है कि लोगों को ये महसूस होने लगा है कि वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं.
अनिश्चित भविष्य
तालेबान को सत्ता से बेदखल करने के कई वर्ष बाद ये लगने लगा था कि वे समाप्त हो रहे हैं.
जिन स्कूलों को तालेबान ने लड़कियों के लिए पाबंद कर दिया था, वहाँ लड़कियाँ फिर से जाने लगीं, महिला संगठन फिर से सक्रिय हो गए और टेलीविजन पर भी महिलाएँ ख़बरें पढ़ती नज़र आने लगीं.
लेकिन अब तालेबान ने प्रमुख महिला शख़्सियतों की हत्या की नई रणनीति तैयार की है.
नैटो और अफ़ग़ान सेनाओं के लिए तालेबान की आत्मघाती हमलों की नई रणनीति और अत्याधुनिक हथियारों से निपटना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा है.
तालेबान को दूसरे देशों ख़ासकर इराक़ से हथियारों की मदद मिल रही है.
अफ़ग़ानिस्तान में अल क़ायदा के कमांडर मुस्तफ़ा बिन याज़िद को खुद इराक़ में गठबंधन सेनाओं से जूझने का अनुभव है.
माना जा रहा है कि तालेबान की आत्मघाती हमलों की नई रणनीति के पीछे उनका ही दिमाग है.
लेकिन ऐसा नहीं है कि हर जंग में तालेबान कामयाब रहा है. मैंने हाल ही में तालेबान के वरिष्ठ नेता से बात की. उनका कहना था कि उनकी तरह कई तालेबान नेता अल क़ायदा के विरोधी हैं.
लेकिन उन्होंने माना कि तालेबान अफ़ग़ान सरकार के ख़िलाफ़ लगातार सफल हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि उनकी योजना काबुल के आसपास अपनी स्थिति मजबूत कर अंतत: इस पर कब्जा करना है.
जब तक नैटो सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद हैं, तब तक ऐसा होना मुमकिन नहीं है.
लेकिन अभी न तो नैटो और न ही राष्ट्रपति करज़ई की सरकार यह समझ पा रही है कि तालेबान के हमलों से कैसे निपटा जाए.