रविवार, 17 जून, 2007 को 13:04 GMT तक के समाचार
नारयण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
कहते हैं कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, लेकिन राजस्थान के दो गाँवों में 462 बीघे में फैली ज़मीन के दाने-दाने पर कबूतरों का नाम लिखा है.
जोधपुर ज़िले के नाड़सर और आसोप गाँवों में 462 बीघा ज़मीन बाक़ायदा कबूतरों के नाम है और इस भूमि की आमदनी से साल भर कबूतरों को चुग्गा डाला जाता है.
ये ज़मीन कबूतरान समिति के नाम है जो इसकी देखभाल करती है और परिंदों के लिए दाने-पानी का इंतज़ाम करती है.
आसोप की कबूतरान समिति के अध्यक्ष डूंगर राम कास्ट ने बीबीसी को बताया कि समिति के पास 22 लाख रुपए की सावधि जमा निधि यानी एफ़डी भी है.
आसोप में इस समिति के पास तीन दुकानें भी हैं.
नाड़सर के सरपंच प्रकाश चंद्र लोढ़ा कहते हैं, ''इन गाँवों में यह सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है. कुछ दयावान लोगों ने सालों पहले ये ज़मीन परिंदों के नाम दान कर दी. 50 साल से तो मैं ही यह परंपरा देख रहा हूँ. वैसे भी मारवाड़ अंचल में जीव दया और परोपकार की प्रवृति कुछ ज़्यादा है.''
जीवन का हिस्सा
दस हज़ार आबादी वाले आसोप में पौ फटते ही कबूतरों की गुटर-गू शुरू हो जाती है. गाँव में कबूतरों के लिए 15 चबूतरे बने हैं और जाली का घेरा बनाकर पक्षियों को सुरक्षा कवच भी मुहैया कराई गई है. इसके अलावा 15 लोग देखभाल के लिए मुफ़्त सेवाएँ भी दे रहे हैं.
प्रकाश चंद्र लोढ़ा बताते हैं, '' नाड़सर में 112 वीघा ज़मीन कबूतरों के नाम है. दस चबूतरे दाना डालने के लिए बनाए गए हैं. रोज एक-दो बोरी धान कबूतर चुग जाते हैं. हालांकि खेती के दिनों कबूतरों की संख्या कम हो जाती है. परिदों की ख़िदमत करना एक सुखद अनुभति है.''
गाँव में दशकों पहले लोगों ने कबूतरों के लिए ज़मीन दान की थी. इस ज़मीन को हिस्सेदारी के तहत काश्त के लिए दिया जाता है और आमदनी पक्षियों के काम आती है.
आसोप के अशोक सिंघवी कहते हैं, ''ये पुण्य का काम है. किसी दिन कबूतर न आएँ तो अजीब लगता है. वे अब इस गाँव का अटूट हिस्सा हैं.''
शुरुआत में आमदनी बढ़ाने के लिए सालाना आय की राशि को ब्याज पर दिया जाता था लेकिन अब एफ़डी करवा दी गई है.
ज़ाहिर है गाँव में विकास के साथ ज़मीन की क़ीमत बढ़ गई है और इस वजह से कबूतरान समिति को कुछ लालची नज़रों से ज़मीन बचाने के लिए सचेत रहना पड़ता है.