बुधवार, 13 जून, 2007 को 13:45 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
राजस्थान की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने तलाक़शुदा औरतों के लिए आरक्षित पदों में भर्ती के लिए अदालत से तलाक़ की 'डिक्री' पाना अनिवार्य कर दिया है.
सरकार की तरफ़ ये आदेश शिक्षा विभाग को जारी किए गए हैं.
सरकार के इस कदम से तलाक़शुदा मुस्लिम औरतों के सामने संकट खड़ा हो गया है क्योंकि मुस्लिम समुदाय में तलाक़ के अधिकतर मामले अदालत तक पहुँचते ही नहीं हैं.
राज्य के कई मुस्लिम संगठनों ने इसे पक्षपातपूर्ण क़दम बताया है. विधि विशेषज्ञों के अनुसार भी सरकार का यह फ़ैसला भेदभाव भरा है.
लेकिन राजस्थान के शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी कहते हैं,"सरकारी नियमों में तलाक़ के लिए 'डिक्री' की ज़रूरत बताई गई है. इस फ़ैसले के विरुद्ध कुछ लोग अदालत भी गए हैं. अदालत जो भी निर्णय देगी, सरकार उसका पालन करेगी."
मुश्किलें
इस सरकारी आदेश से तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए ज़िंदगी की राह और भी कठिन हो गई है.
जयपुर की रहने वाली एक तलाक़शुदा नसीम बानो की शादी सात साल पहले हुई थी.
पति के तलाक देने के बाद नसीम बानो को भारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा.
नसीम ने हार नहीं मानी और तालीम हासिल की और नौकरी के लिए अर्ज़ी दी.
लेकिन सरकार ने तलाक़ का पारंपरिक तरीका मानने से इंकार कर दिया.
नसीम कहती हैं,"मैं अब अदालती डिक्री कहाँ से लाऊँ. तलाक तो ज़िल्लत का वो तोहफ़ा है जो हमारे गले में लटका दिया गया है."
वो कहती हैं,"अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी संवारने के लिए मैंने एमए, एमफ़िल और बीएड की डिग्री हासिल की. अब उस शौहर को कहाँ जाकर तलाश करूँ जो अदालत जाकर कहे कि मैंने नसीम को तलाक दे दिया है."
ये संकट झेल रही नसीम बानो अकेली औरत नहीं हैं. ऐसी कोई 50 औरतें हैं जो सरकार से विनती करती घूम रही हैं.
'डिक्री'
सवाई माधोपुर की सितारा बानो की भी यही कहानी है.
वो कहती हैं,"तमाम मुश्किलों के बीच शिक्षा प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश की तो सरकार ने धोखा दे दिया. एक औरत पढ़ती है तो वो 50 लोगों को और भी पढ़ा सकती है. सरकार मुसलमानों के साथ अन्याय कर रही है."
विधि विशेषज्ञ प्रेमकृष्ण शर्मा कहते हैं,"मुस्लिम क़ानून के मुताबिक इन्हें अदालत से 'डिक्री' के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. अदालतें पहले भी ऐसे कई निर्णय सुना चुकी हैं. मैंने इन तलाक़शुदा महिलाओं के कागज़ देखे हैं. इनके पास क़ाज़ी के कागज़ात हैं. इन्हें अदालती डिक्री के लिए मजबूर करना सही नहीं है."
सामाजिक कार्यकर्ता निशात हुसैन कहती हैं,"इन लड़कियों ने समाज और परिवार की विषम परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की ताकि अपनी बेहतरी साबित कर सकें. क्या यही इनकी ग़लती है?"