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शनिवार, 09 जून, 2007 को 10:35 GMT तक के समाचार

रेणू अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

कौन बनेगा भारत का अगला राष्ट्रपति?

कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर इस समय भारत के राजनीतिक गलियारों में सौ टके का एक सवाल है - 'कौन बनेगा राष्ट्रपति.'

वीवी गिरी और संजीवा रेड्ड़ी के बीच 1969 की राष्ट्रपति पद की चुनावी होड़ के बाद शायद अब पहली बार ये चुनाव चर्चा का विषय बना है.

राजनीतिक विश्लेषक महेश रंगराजन कहते हैं, "इस बार केंद्र की यूपीए सरकार के पास पचास फ़ीसदी से कम मत हैं. अगर किसी वजह से यूपीए, वामपंथियों और बसपा में समझौता नहीं हो पाता है तो यूपीए को चुनाव जीतने में मुश्किल हो सकती है. और मुझे लगता है कि हमारे पिछले दो राष्ट्रपतियों केआर नारायणन और और अब्दुल क़लाम ने लोगों के मन में पद की गरिमा को बहुत बढ़ाया है."

हालत ये है कि अगर आप किसी बाज़ार या नुक्कड़ में आम जनता के बीच भी ये सवाल पूछें तो सभी राष्ट्रपति कैसा हो इस पर अपनी राय व्यक्त करते नज़र आते हैं.

शायद जनता के राष्ट्रपति या पीपुल्स प्रेसीडेंट के नाम से पहचाने जाने वाले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल क़लाम, राष्ट्रपति के पद को छोटे-बड़े सभी के मानस पटल तक पहुँचाने में सफल हुए हैं.

बहस

वहीं मीडिया ने राष्ट्रपति पद को लेकर कई सर्वेक्षण करवा कर इस बहस को जीवित कर रखा है.

चर्चा इस पर भी ज़ोरों पर है कि राष्ट्रपति एक राजनीतिक पृष्ठभूमि का हो या कोई बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता जो देश की शान बढ़ा सके?

अंग्रेज़ी दैनिक 'पाइनियर' के संपादक चंदन मित्रा का मानना है कि राजनीतिक परिपक्वता वाला व्यक्ति ही गठबंधन राजनीति के इस दौर में सही रहेगा.

चंदन मित्रा कहते हैं, "राजनीति और संविधान का कोई जानकार ही देश का राष्ट्रपति होना चाहिए. अगर देश के सामने कोई जटिल विषय आए तो वो इन मुद्दों को सुलझा सके."

पत्रकार नीरजा चौधरी तो राष्ट्रपति के राजनीति से जुड़े होने या न होने की पूरी बहस को ही बेमानी मानती है.

उनका कहना है, "ये एक नकली बहस है. उम्मीदवार राजनीतिक हो या न हो. इससे अधिक ज़रूरी ये देखना है कि उम्मीदवार कैसा है."

राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए जो ज़ैल सिंह की तरह अपने प्रधानमंत्री के कहने पर झाड़ू उठा कर सफाई करने को तैयार न हो.

पर कुछ हद तक केआर नारायणन की तरह हो जो कांग्रेस से जुड़े रहे हों लेकिन पद पर रहने के दौरान वो अपने व्यवहार और कार्यशैली से किसी भी पार्टी से जुड़े नज़र नहीं आए.

राष्ट्रपति का कद ऐसा हो कि जो रोज़मर्रा के झगड़ों के ऊपर रहे.

राष्ट्रपति अब्दुल क़लाम

कुछ हद तक एपीजे अब्दुल क़लाम को सफल राष्ट्रपति माना जा सकता है.

पर महेश रंगराजन इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं कि हाल के उनके कुछ बयान दिखाते हैं कि क़लाम जैसे राष्ट्रपति की दिक्कतें क्या हैं.

रंगराजन बताते हैं,"अभी दो हफ़्ते पहले राष्ट्रपति ने कह दिया कि देश में दो दलीय व्यवस्था हो. ये एक कठिन सवाल है. इस पर तय करने वाले मतदाता हैं और देश के राजनीतिक दल हैं. उन्होंने नदियों के जोड़े जाने पर भी परियोजना बनाने के वकालत की है. ये सब विवादास्पद मामले हैं. इस तरह मुद्दों पर वो न बोलें तो ही अच्छा है."

अब नज़रें कुछ हद तक बहुजन सामज पार्टी नेता मायावती पर हैं कि वे किस उम्मीदवार पर अपनी मुहर लगाती हैं.

उम्मीदवारों के नाम लगातार आ रहे हैं और बदल रहे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वाम नेताओं से हुई बातचीत में प्रणव मुखर्ज़ी, सुशील कुमार शिंदे और कर्ण सिंह के नामों की चर्चा हुई थी.

फिर जब सोनिया गांधी डीएमके नेता करुणानिधि से मिलीं तो करण सिंह का नाम सूची से बाहर हुआ और शिवराज पाटिल और अर्जुन सिंह का नाम जुड़ गया.

आगे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे मोती लाल बोरा का नाम भी उछला.

कांग्रेस में उम्मीदवार का अपनी नेता के प्रति आस्था होना उम्मीदवार बनने का सबसे बड़ा मापदंड हैं.

जहाँ तक यूपीए सरकार का सवाल है तो उसके लिए कई मंत्रिमंडलीय समूहों की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी संभाल रहे प्रणव मुखर्ज़ी को सरकार से हटाना मुश्किल नज़र आ रहा है.

हालांकि वो वामपंथी दलों को पसंद हैं.

बीएसपी नेता मायावती की पसंद पर नीरजा चौधरी का कहना है,"मेरा मानना है कि वो किसी उम्मीदवार पर तो नहीं अटकेगीं. उनका ताज़ कॉरिडोर का मामला सुलझ गया है. अपने राज्य के लिए उन्होंने बड़ा आर्थिक पैकेज़ मांगा है. फिर भी वो किसी दलित नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने की बात उठा सकती हैं. मायावती नहीं चाहेंगी कि कोई अन्य नेता दलित राजनीति का केंद्र बनकर उभरे."

शेखावत की उम्मीदवारी

मौज़ूदा उपराष्ट्रपति भैरोसिंग शेखावत भी राष्ट्रपति के उम्मीदवार हैं. अगर वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ते हैं तो भी उनेक लिए जीत हासिल करना आसान नहीं नज़र आता.

यूपीए और वाम दलों के पास 5.2 लाख मत हैं, एनडीए के पास 3.5 लाख और अन्य क्षेत्रीय दलों के पास 1.2 लाख मत हैं.

अगर एनडीए और अन्य दल साथ भी हो जाते हैं तो भी वो यूपीए और बसपा के साथ होने की स्थिति में इस दौड़ में ख़ासे पीछे रह जाएंगे.

कुल मिलाकर अब 10 जनपथ की पसंद और मायावती की उस पर मुहर ही तय करेगी कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा.