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शुक्रवार, 08 जून, 2007 को 10:44 GMT तक के समाचार

सुबीर भौमिक
बीबीसी संवाददाता, कोलकाता

बड़े बांध बनाने को क़ानूनी चुनौती

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पर्यावरण के लिए काम करने वाली एक संस्था की याचिका स्वीकार कर ली है जिसमें पूर्वोत्तर भारत में बड़े बांधों के निर्माण को चुनौती दी गई है.

'एनवायरमेंट प्रोटेक्शन एंड सस्टेनेबल सोसाइटी' (ईपीएसएस) ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 13 बड़े बांधों के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.

इस संस्था का कहना है कि बड़े बांधों से पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा और हज़ारों आदिवासी विस्थापित होंगे.

ईपीएसएस ने अपनी याचिका में कहा है कि इन बांधों से अरुणाचल प्रदेश और असम के भविष्य को ख़तरा पैदा हो सकता है क्योंकि दोनों राज्य भूकंप संभावित क्षेत्र में आते हैं और पिछले सौ वर्षों में इस इलाक़े में दो भयंकर भूकंप आ चुके हैं.

ग़लत आकलन

संस्था का कहना है कि बड़े बांधों पर जल बिजली परियोजनाओं का खाका तैयार करते समय पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित असर का ग़लत आकलन किया गया है.

इसमे इस तथ्य को दरकिनार किया गया है कि बांध बनने से कई अभ्यारण्य और पक्षी विहार उजड़ जाएंगे जहाँ कई विलुप्त होने की कगार पर पहुँची कई प्रजातियाँ निवास करती हैं.

याचिका को स्वीकार करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, अरुणाचल प्रदेश और असम की सरकारों समेत कई अन्य सरकारी एजेंसियों को नोटिस जारी कर ईपीएसएस के आरोपों का जवाब देने को कहा है.

भारत सरकार अरुणाचल प्रदेश को देश के 'पावरहाउस' में तब्दील करना चाहती है क्योंकि यहाँ बड़े बांध बनाकर 40 हज़ार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है.

केंद्र सरकार कई परियोजनाओं को हरी झंडी दे चुकी है जिनसे 23 हज़ार मेगावाट बिजली पैदा होगी. सरकारी कंपनियों ने 13 परियोजनाओं के लिए टेंडर भी जारी कर दिए हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि सस्ती और पर्याप्त बिजली भारत के आर्थिक विकास की दिशा तय करेगी.

कुछ बड़ी परियोजनाओं पर काम भी शुरू हो चुका है जिनमें दो हज़ार मेगावाट क्षमता वाली सुबनसिरी परियोजना शामिल है.

विस्थापन

केंद्र सरकार का तर्क है कि अरुणाचल प्रदेश सघन आबादी वाला राज्य नहीं है, इसलिए विस्थापन न के बराबर होगा.

लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र दुनिया के गिने चुने जैव विविधता वाले क्षेत्रों में आता है.

जनजातीय संगठनों का कहना है कि विस्थापन के बाद कम आबादी वाले कई स्थानीय समुदायों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ सकता है.

पर्यावरण के जानकार दुलाल गोस्वामी कहते हैं, "बड़े बांधों का इस इलाक़े के पर्यावरण पर होने वाले असर के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस बारे में गहरा अध्ययन नहीं हुआ है."

नीरज वागोलिकर कहते हैं कि पहाड़ों की तराई में रहने वाले लोगों पर होने वाले असर का सही आकलन नहीं किया गया है. वो कहते हैं, "असम इन बड़े बांधों से बड़े ख़तरे में हैं."