गुरुवार, 07 जून, 2007 को 03:08 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, उत्तरप्रदेश
खेतिहर ज़मीन के फ़र्ज़ी कागज़ात बनाने के कथित मामले में फ़िल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फ़ैसला सुरक्षित कर दिया है.
न्यायमूर्ति डीपी सिंह ने दो घंटे लंबी चली बहस के बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रख दिया.
खचाखच भरे अदालती कक्ष में अमिताभ बच्चन, ग्राम समाज और सरकार की ओर से जोरदार बहस हुई जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया गया.
अमिताभ बच्चन के वकील मुकुल रोहतगी का मुख्य रूप से ज़ोर इस बात पर था कि अधीनस्थ न्यायालयों ने उन्हें सुनवाई का पूरा मौक़ा दिए बिना ही उनके ख़िलाफ़ जालसाज़ी और धोखाधड़ी का निष्कर्ष निकाल दिया.
दूसरी ओर सरकारी वकील देवेंद्र उपाध्याय का तर्क था कि अमिताभ बच्चन आज तक यह साबित नहीं कर सके कि उन्हें ज़मीन कहाँ से मिली है.
उपाध्याय की दलील थी कि जहाँ धोखाधड़ी का मामला प्रत्यक्ष हो, वहाँ अवसर देने के नैसर्गिक न्याय की माँग नहीं की जा सकती है.
ग्राम समाज के वकील आरएन गुप्ता ने अपनी बहस में इस बात पर ज़ोर दिया कि ज़मीन के रिकॉर्ड तीन रजिस्टर में दर्ज होते हैं जबकि इस मामले में केवल एक रजिस्टर में नाम दर्ज है.
इस मामले में एक जनहित याचिका दायर करनेवाले सत्यनारायण शुक्ला के वकील महफ़ूज आलम की दलील थी कि चूंकि उनकी याचिका पहले से ही लंबित है इसलिए उनपर पहले सुनवाई की जाए.
इस याचिका में कहा गया है कि उसी गाँव के भूमिहीन को ज़मीन दी जा सकती है जबकि अमिताभ मुंबई निवासी हैं. इस याचिका में मामले की सीबीआई से जाँच कराने की माँग की गई है.
मामला
इससे पहले फ़ैज़ाबाद की राजस्व अदालत ने अपने फ़ैसले में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में अमिताभ बच्चन के नाम ज़मीन दर्ज कराने को धोखाधड़ी ठहराया था.
लेकिन अमिताभ दौलतपुर गाँव की इस ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ बनाए रखने के लिए निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट गए हैं.
सरयू किनारे स्थित कुल दो बीघा पाँच बिस्वा ज़मीन अब उनके जी का जंजाल बन गई है.
अमिताभ बच्चन का दावा है कि 10 सितंबर 1982 में एक चकबंदी अदालत ने उनके पक्ष में ज़मीन दर्ज करने का आदेश दिया था जिसके अनुपालन में 11 जनवरी 1983 को उनका नाम कलेक्ट्रेट की खतौनी में दर्ज हो गया.
लेकिन मार्च, 2006 में जब अमिताभ बच्चन ने इस खतौनी की नकल लेकर तहसील के रिकॉर्ड में भी मालिकाना हक़ दर्ज करने का आवेदन किया तो बाराबंकी के ज़िलाधिकारी ने उनका दावा इस आधार पर ख़ारिज कर दिया कि दस्तावेजों में हेराफेरी करके उनके पक्ष में नकल जारी की गई.
हालाँकि एक महीने बाद ही दूसरे ज़िलाधिकारी ने अमिताभ को राहत देते हुए उनका नाम अस्थायी तौर पर तहसील रिकॉर्ड में दर्ज करा दिया और उनसे अपने दावे के पक्ष में सबूत पेश करने को कहा.
इन्हीं दोनों आदेशों के ख़िलाफ़ अमिताभ फैज़ाबाद कमिश्नर की अदालत में चले गए.
अतिरिक्त कमिश्नर फैज़ाबाद ने भी एक जून को उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया और कहा कि अमिताभ के नाम ज़मीन थी ही नहीं.
अमिताभ को डर है कि अगर इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत ने स्थगित या रद्द नहीं किया तो उन्हें महाराष्ट्र के पुणे में 24 एकड़ महँगे फार्म हाउस से हाथ धोना पड़ सकता है.
बिग बी ने महाराष्ट्र में यह ज़मीन 2000-2001 में ख़रीदी थी और स्थानीय क़ानून के मुताबिक कोई किसान ही यह ज़मीन ख़रीद सकता है.