गुरुवार, 31 मई, 2007 को 12:47 GMT तक के समाचार
विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, छत्तीसगढ़ से लौटकर
दिन था 26 जनवरी 1998.
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ शहर में एक आदिवासी महिला सत्यभामा की मौत हो गई. वह अनशन पर थी.
रायगढ़ की केलो नदी का पानी एक स्थानीय उद्योग को दिए जाने के विरोध में सत्याभामा अनशन कर रही थी.
नदी का पानी उद्योग को दिया जाना न रुकना था, न रुका. उल्टे आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों पर हत्या और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे मुक़दमे दायर हो गए.
वह शायद छत्तीसगढ़ में पानी के लिए हुई पहली मौत थी.
लेकिन पानी की कमी अब छत्तीसगढ़ की आम समस्या बन गई है.
पानी वाला राज्य?
उसी छत्तीसगढ़ में जिसे पानी वाला राज्य माना जाता था. इसके दो कारण थे.
एक वहाँ प्रतिवर्ष औसत वर्षा 50 इंच से अधिक है और दूसरा राज्य को तालाबों का राज्य माना जाता था.
बारिश का पानी रोकने की एकमात्र व्यवस्था तालाब थे. लेकिन अब तालाबों की जगह बस्तियाँ बसती जा रही हैं.
नदियों और बाँधों का पानी उद्योगों को दिया जा रहा है और वह पानी भी पूरा नहीं पड़ रहा तो उन्हें अपने परिसर में बड़े बोरवेल बनाने की अनुमति दे दी गई है.
रायगढ़ के पूर्व विधायक रामकुमार अग्रवाल कई साल से जल, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वे कहते हैं, "सरकार ने उद्योंगों को 12-12 इंच डायमीटर के हज़ार-डेढ़ हज़ार फुट गहरे बोरवेल खोदने की अनुमति दे दी है. एक-एक उद्योग ने अपने परिसर में सौ-सौ बोरवेल खोद रखे हैं."
वे बताते हैं कि इसका असर यह हुआ है कि रायगढ़ शहर में जहाँ भूजल स्तर 60-65 फुट था, अब पानी 400 फुट तक नीचे चला गया है.
और यह समस्या सिर्फ़ रायगढ़ की नहीं है. यही समस्या रायपुर शहर भी झेल रहा है और दूसरे कई शहर भी.
रायपुर की एक गृहणी ने बीबीसी से कहा, "पहले एक बार पंप चलाओ तो पाँच मिनट में पानी की टंकी भर जाती थी लेकिन अब तीन-चार बार पंप चलाने पर भी टंकी भरने जितना पानी नहीं मिलता."
इसी तरह दीपका कोल माइन्स के इलाक़े में रहने वाले जावेद अख़्तर ने अपना कुँआ दिखाते हुए बताया कि 1991 में जब वे वहाँ पहुँचे थे तो पानी 12-13 फुट पर था लेकिन अब 40 फुट पर पानी नहीं है.
वे कहते हैं, "अब रात भर पानी इकट्ठा होता है जब कही बाल्टी-बाल्टी पानी निकलता है."
और इतना भर नहीं है. औद्योगिक प्रदूषण इतना है कि सतह पर जो पानी है उस पर भी काली परत जमती जा रही है.
एक किसान रामकुमार परगनिहा कहते हैं, "चाहे तालाब का पानी हो या घर की टंकी का, सुबह उसे छाने बिना तो मुँह भी नहीं धो सकते."
चिंता
छत्तीसगढ़ में दो तरह के उद्योग तेज़ी से बढ़ रहे हैं. एक इस्पात उद्योग और दूसरा बिजली घर. और इन दोनों ही उद्योंगों को पानी की बहुत ज़रुरत होती है.
पिछसे कई सालों में राज्य में पानी के लिए कोई बड़ी परियोजना नहीं बनी है. इससे हुआ यह है कि उद्योंगो को कृषि या निस्तार का पानी ही दिया जा रहा है.
इससे लोग बड़ी मुश्किल में हैं. सिलतरा स्पाँज आयरन इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल नचरानी दयनीय स्वर में कहते हैं, "पानी के सवाल का जवाब न हमारे पास है न सरकार के पास."
वे कहते हैं, "उद्योगों को पानी चाहिए लेकिन जब लोगों को पानी पीने के लिए न मिल रहा हो तो उद्योग किस तरह पानी माँग सकते हैं."
सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक देवजी पटेल इस संकट के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. वे मानते हैं कि सरकार ने बिना कोई नीति बनाए पानी का दोहन शुरु कर दिया है.
सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि यदि विकास की क़ीमत पानी के लिए इतना बड़ा संकट झेलना है तो विकास की इस अवधारणा पर फिर से विचार करना होगा.
विश्व स्तर पर चिंता जताई जा रही है कि औद्योगिक विकास अगर संयोजित नहीं हुआ तो लोगों को पानी जैसी मूलभूत चीज़ों के लिए गंभीर समस्या का सामना करना पड़ेगा और यह समस्या छत्तीसगढ़ में जीवंत होती दिख रही है.